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Vaigyanik Bhautikvad

Vaigyanik Bhautikvad

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  • Pages: 168p
  • Year: 2014, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180318627
  •  
    'वैज्ञानिक भौतिकवाद' आज के वैज्ञानिक युग के उस चरण की व्याख्या है जिसमे साइंस के नाम पर मृत विचारों की अपेक्षा नये वैज्ञानिक विचारों व आलोक में मानवीय नैतिकता, धर्म, समाज, दर्शन, मूल्यवत्ता और मानवीय संबंधों की व्याख्या की गयी है | जर्मन दार्शनिक हीगेल ने जिस द्वंद्वात्मक सिद्धांत पर आध्यात्मिकता की व्याख्या की थी, मार्क्स ने उसी द्वंद्वात्मक सिद्धांत के प्रयोग से भौतिकवाद की व्याख्या की | राहुल जी की पुस्तक वैज्ञानिक भौतिकवाद मूलतः द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को ही प्रतिपादित करने के लिए लिखी गयी पुस्तक है | पुस्तक को विद्वान लेखक ने तीन मुख्या अध्यायों में बाँटकर, इतिहास, दर्शन, समाजशास्त्र और धर्म आदि की पूरी व्याख्या प्रस्तुत की है | यह पुस्तक राहुल जी ने सबसे पहले 1942 में लिखी थी जबकि देश में गाँधी जी और गांधीवादी का बड़ा प्रबल समर्थन व्याप्त था | इसमें भारतीय सन्दर्भ को लेकर गांधीवाद की विवेचना है | भारतीय चिंतन और दर्शन की दृष्टि से यह पुस्तक सर्वप्रथम भारतीय साहित्य में विशेषकर हिंदी में एक बहुत बड़ी कमी की पूर्ती करती है | दार्शनिक दृष्टि से 'वैज्ञानिक भौतिकवाद' अपनी छोटी-से काया में ही अट्ठारहवी और उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोपीय चिंतन को सूत्र रूप में भारतीय सन्दर्भ के साथ प्रस्तुत करती है | वस्तुतः इस पुस्तक के अध्ययन से कोई भी भारतीय भाषा-भाषी पाश्चात्य चिंतन-प्रणाली को भली-भांति जान सकता है |

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    Rahul Sankrityayan

    राहुल सांकृत्यायन

    जन्म : 9 अप्रैल, 1893 ई.

    मूर्धन्य और अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान राहुल सांकृत्यायन साधु थे, बौद्ध भिक्षु थे, यायावर थे, इतिहासकार और पुरातत्त्ववेत्ता थे, नाटककार और कथाकार थे और थे जुझारू स्वतंत्रता-सेनानी, किसान-नेता, जन-जन के प्रिय नेता। उनके अनन्य मित्र भदंत आनन्द कौसल्यायन के शब्दों में, ''उन्होंने जब जो कुछ सोचा, जब जो कुछ माना, वही लिखा, निर्भय होकर लिखा। चिन्तन के स्तर पर राहुल जी कभी भी न किसी साम्प्रदायिक विचार-सरणी से बँधे रहे और न संगठित-सरणी से। वह 'साधु न चले जमात' जाति के साधु पुरुष थे।

    राहुलजी ने धर्म, संस्कृति, दर्शन, विज्ञान, समाज, राजनीति, इतिहास, पुरातत्व, भाषा-शास्त्र, संस्कृत ग्रंथों की टीकाएँ, अनुवाद और इसके साथ-साथ रचनात्मक लेखन करके हिन्दी को इतना कुछ दिया कि हम सदियों तक उस पर गर्व कर सकते हैं। उन्होंने जीवनियाँ और संस्मरण भी लिखे और अपनी आत्मकथा भी। अनेक दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज और संग्रहण के लिए व्यापक भ्रमण भी किया।

    निधन : अप्रैल, 1963 ई.

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