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Vyavdhan : Bikhari Aas Nikhari Preet

Vyavdhan : Bikhari Aas Nikhari Preet

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  • Pages: 351p
  • Year: 2011
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180316227
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    'व्यवधान' पर अभिमत इस उपन्यास को बड़े चाव से पढ गया । मुझे प्रसन्नतापूर्ण विस्मय हुआ । घर के भीतर दुनिया का इन्होंने सजीव चित्र उपस्थित किया है । इनके पात्र जाने पहचाने से लगते हैं । अत्यन्त परिचित वातावरण के भीतर इन्होंने कई अविस्मरणीय पात्रों की सृष्टि की है और विपत्तियों की आँधी को स्वर्ग की सीढ़ी में बदल दिया है । नारी पात्र बहुत सशक्त हैं । -आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी इस उपन्यास में भारतीय आदर्शो एवं सात्त्विकता के प्रति असीम संवेदना है । श्रीमती शान्ति कुमारी बाजपेयी में एक सबल कलाकार है, इस उपन्यास को पढ़कर मुझे ऐसा अनुभव हुआ ।... 'व्यवधान' में किसी समस्या को नहीं उठाया गया है । प्रत्येक श्रेष्ठ कला की भाँति यह उपन्यास मानवीय संवेदना को लेकर चलता है । . ..भाषा मँजी हुई और गठी हुई है । मैं ऐसा समझता हूँ कि उनकी अपनी निजी शैली है, जो आगे चलकर हिन्दी साहित्य में अपना स्थान बना लेगी । यही नहीं, श्रीमती बाजपेयी में एक तरह का संतुलन है जो श्रेष्ठ कला का अनिवार्य अंग माना जाता हैं । -भगवतीचरण वर्मा उपन्यास का सम्पूर्ण कथानक हृदयग्राही है । पात्रों को जीवन्त रूप में प्रस्तुत करने और उनकी चारित्रिक विशेषताओं को उभारने में आपकी रोचक एवं संवेदनामयी संवाद-योजना अत्यन्त सफल हुई है । भाषा-शैली की प्रेषणीयता भी स्तुत्य है । डी. नगेन्द्र काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका सुश्री शान्ति कुमारी बाजपेयी की कृति 'व्यवधान' को मैंने बड़े मनोयोग से पढ़ा । मुझे आश्चर्य हुआ । .. ...उनकी प्रथम रचना होकर भी यह उपन्यास अपने में सर्वथा प्रौढ़ कृति मालूम पड़ता है । कथानक के गुम्फन में सफाई है और उसके भीतर क्रमागत रूप में परिस्थितियों की योजना बड़ी ही विशद है । पात्रों के चरित्र में निखार है, उनका अपना-अपना स्वतन्त्र विकास हुआ है और उनके मनोवैज्ञानिक उतार-चढाव की गति में पर्याप्त निर्मलता है । -डॉ. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा आपकी भाषा के प्रवाह, शैली के सामर्थ्य तथा चरित्र-चित्रण के कौशल से अत्यधिक प्रभावित हुआ । नामानुसार 'व्यवधान' के प्रसंग यत्र-तत्र मिलते हैं तथा 'आस' का 'बिखरना' एवं 'प्रीत' का 'निखरना' भी पल-पल पर दिखाई देता है । दोनों ही नामकरण पूर्णत: यथार्थ हैं । आरम्भ और अन्त के प्रकरणों ने तो मुझे बार-बार रुलाया । आपकी रचना में जो सजीवता, भावनात्मक धड़कन और स्वानुभव का पुट है, उससे इस उपन्यास ने 'आद्य' होते हुए भी अपना 'प्रथम' स्थान बना लिया है । -स्व. डी. पंडित ओंकारनाथ ठाकुर उपन्यास लेखन एक दुस्तर सेतु को पार करने सरीखा है । हर्ष का विषय है कि श्रीमती शान्ति कुमारी बाजपेयी ऐसे प्रयास में कृतकार्य हुई हैं । उनकी कृति 'व्यवधान' का मैं स्वागत करता हूँ और एतदर्थ उन्हें हार्दिक बधाई देता हूँ । -श्री राय कृष्णदास

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    Shanti Kumari Bajpai

    जन्म: 2 अक्टूबर, 1919, बरेली (उत्तर प्रदेश)।

    शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी), काशी हिन्दू विश्वविद्यालय; प्रारम्भिक शिक्षा महिला कॉलेज, लखनऊ।

    अध्यापन: महिला महाविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (1948 से 1976)।

    प्रकाशित कृतियाँ:

    उपन्यास: व्यवधान, नदी लहरें और तूफ़ान, फूल पराग पंखुड़ियाँ, अरे! यह कैसा मन, घुँघरू

    हिन्दी साहित्य विवेचना: केशव की रामचन्द्रिका पर एक : ष्टि; मैथिलीशरण गुप्त: कवि का कृतित्व

    लघु नाटिका: घर भी एक क्यारी है

    स्वर्गारोहण: 28 जनवरी, 2005 लखनऊ (उत्तर प्रदेश)।

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