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Yeh Prithvi Tumhein Deta Hoon

Yeh Prithvi Tumhein Deta Hoon

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  • Pages: 163p
  • Year: 2013
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180317491
  •  
    मार्कण्डेय की ख्याति एक कथाकार के रूप में विशेष है । लेकिन उन्होंने कविता और कहानी साथ-साथ लिखना शुरू किया था । सन् १९५४ में उनका पहला कहानी-संग्रह यान-फूल और सर १९५६ में पहला कविता संग्रह 'सपने तुम्हारे थे' नाम से आया था । 'सपने तुम्हारे थे' के बाद उनका फिर कोई दूसरा काव्य-संग्रह नहीं आया । लेकिन फिर सन् २००६ की जनवरी में सतीश जमाली द्वारा सम्पादित पत्रिका नयी कहानी' का अंक एकाएक हाथ लगा । देखा, उसमें मार्कण्डेय की भी छह कविताएँ थी 1 मार्कण्डेय जी से पूछा तो पता चला कि ये कविताएँ १९८० के दशक में लिखी गयी कविताओं में से छाँटकर नयी कहानी में छपने को दी गयी थीं । इस तरह यह भेद खुला कि मार्कण्डेय ने अपने कवि को सपने तुम्हारे थे' के साथ कोई अन्तिम विदाई नहीं दे दी थी 1 अलबत्ता काव्य- रचना के क्षेत्र में एक लम्बा मौन जरूर उन्होंने साध रखा था, जो शायद सन् '८ ० के दशक में टूटा-भले ही बहुत थोड़े समय के लिए ही सही! बहरहाल, प्रस्तुत संग्रह में मार्कण्डेय के पहले काव्य- संकलन सपने तुम्हारे थे' की कविताओं के साथ सन् '८ ० के दशक में लिखी गयी उनकी कविताओं को भी सम्मिलित किया गया है । मार्कण्डेय कविता की 'कला' सीखने से ज्यादा चाव रखते हैं यह सीखने में कि कविता में शब्दों को किसी सार्थक उद्देश्य से कैसे जोड़ा जाय! 'अभी तो मैं सीख रहा हूं शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ देखिए- अगर संभव हुआ गे निहाई ले आऊँगा हथौड़े से पीटूँगा हसिया बनाऊँगा फिर मैं सीखूँगा शब्दों को गर्म करना नाबदानों और वैश्यालयों में पड़े- पड़े वे घिनौने बदकार और चापलूस हो गये हैं.. सीखने की कोई उम्र नहीं होती । मगर यह सब सीखने में मार्कण्डेय के कवि-रूप को कितनी सफलता मिली या यह सब सीखने में कविता का क्या-क्या दाँव पर लगा-इसकी जाँच-परख इन कविताओं के पाठक अपने विवेक से करेंगे, ऐसी आशा है । राजेन्द्र कुमार

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    Markandey

    2 मई, 1930 में बराई गाँव-जिला जौनपुर में जन्में मार्कण्डेय की प्राथमिक शिक्षा गॉव में, आगे  की पढाई प्रतापगढ़ से उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अर्जित किया ।

    मार्कण्डेय स्वाधीन भारत के कथाकार थे, लेकिन वे गहरे अर्थों में भारतीय सामाजिक चेतना के भी कथाकार रहे है । उन्होंने अपनी कहानी का आरम्भ वहीं से किया जहॉ प्रेमचन्द ने कहानी को छोडा था। प्रेमचन्द की ही तरह मार्कण्डेय भी मूलत: देशज संवेदना के कथाकार थे । प्रेमचन्द की परम्परा से मार्कण्डेय का रिश्ता महज ग्रामीण यथार्थ का ही न होकर उस समूचे सामा-जिल ताने- बाने का भी था जिसके बिना न तो किसी

    पारम्परिक समाज को समझा जा सकता है और न उसके आगत क्री आहटें सुनी जा सकती है । मार्कण्डेय देश के राजनीतिक जनतंत्र का उत्सवीकरण करने के बजाय अपनी कहानियों में उसका सामाजिक और

    आर्थिक क्रिटीक रचते है ।

    कहानियों के अलावा तो उपन्यास 'सेमल के फूल' तथा ‘अग्निबीज’ एकांकी-संग्रह "पत्थर व परछाइयाँ, काव्य-संभ्रह 'सपने तुम्हारे थे' तथा ‘यह पृथ्वी तुम्हें देता हूँ’,  आलोचना ‘कहानी की बात’, ‘नयी कहानी : यथार्थवादी नजरिया, प्रगतिशील साहित्य की जिम्मेदारी, साहित्य संवाद कल्पना में चक्रधर नाम से लिखा गया स्तम्भ ‘चक्रधर की साहित्यकार' नाम से प्रकाशित ।

    निधन : 18 मार्च, 2010 ।

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