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Katlgaah

Katlgaah

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  • Pages: 415p
  • Year: 2002
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171197256
  •  
    रॉबर्ट पेन का उपन्यास कत्लगाह बांगलादेश के मुक्ति-संघर्ष की पृष्ठभूमि पर रचा गया संभवत: एकमात्र उपन्यास है । बांगलादेश का मुक्ति-संघर्ष दुनिया के इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है जो बताता है कि तानाशाही और फौजी दमन का बडे से बड़ा उपक्रम किसी देश की मुक्तिकामी जनता के संघर्ष के आगे किस तरह पराजित हो जाता है । कत्लगाह' इस संघर्ष को दुबारा अपने पृष्ठों पर साकार करता है । इसे पढते हुए हम महसूस करते है कि संघर्ष सिर्फ एक शब्द नहीं होता । वह व्यापक धैर्य और त्याग की माँग करता है । संघर्ष कर रही जनता को अकल्पनीय दमन और अत्याचार से गुजरना पड़ता है । उसके छात्रों और बुद्धिजीवियों को गोली मार दी जाती है । उसके घर-गांव जलाकर राख कर दिए जाते है । उसकी औरतों को सामूहिक बलात्कार की यातना से गुजरना पडता है । अंग-भंग, अत्याचार और तबाही का एक पूरा चक्र उसे अपने सीने पर झेलना पड़ता है । कत्लगाह' यह भी बताता है कि इतने सारे अत्याचारों की चट्‌टान के नीचे भी, मुक्ति के संघर्ष का एक पौधा लहलहाता रहता है । वह भिंची हुईं मुट्‌ठियों, तने हुए माथों, उठे हुए हाथों की शक्ल में धीरे-धीरे बढता जाता है । एक दिन सारी चट्‌टानें दरक जाती है और सिर्फ पौधा बचा रहता है । कत्लगाह जितना उपन्यास है, उतना ही इतिहास भी । रॉबर्ट पेन ने ब्यौरे में जाकर, सारे तथ्य इकट्‌ठा करते हुए जितनी प्रामाणिकता के साथ इस इतिहास को सामने रखा है, वह चमत्कृत करता है । यह लेखकीय कौशल का ही - प्रमाण है कि न उपन्यास इतिहास के साथ छेड़छाड़ करता है, और न ही इतिहास उपन्यास के प्रवाह को बाधित करता है । तथ्य और कल्पना इस तरह घुले-मिले हैं कि वे एक-दूसरे को सहारा देते है । लेखकीय तटस्थता तथ्य के साथ पूरा न्याय करते हुए भी .उस मानवीय संवेदना का स्पर्श करती है जो इस संघर्ष को एक उदात्त स्वरूप देती है । इस उपन्यास के ब्यौरों से गुजरते हुए एक थरथराहट बहुत भीतर तक महसूस की जा सकती है, जो धीरे-धीरे तल्लीनता में बदलती है और आखिर में इस विश्वास में कि मुक्ति की कामना अगर सच्ची हो तो वह कभी पराजित नहीं होती ।

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    Robert Payne


    रॉबर्ट पेन
    रॉबर्ट पेन का जन्म सन् 1911 में कॉर्नवॉल, इंग्लैंड में हुआ था ।
    उनकी शिक्षा केपटाउन, लीवरपूल, म्यूनिख और सोरबीन के विश्वविद्यालयों में पूरी हुई ।
    द्वितीय विश्वयुद्ध में जिस समय हिटलर की सेना वियना पहुँची, उस समय रॉबर्ट पेन वहीं थे. वे कुछ समय तक रिपब्लिकन स्‍पेन में युद्ध संवाददाता भी रहे और जब वे सिंगापुर की नौसेना के अड्‌डे पर अधिकारी थे. उन्हीं दिनों वहाँ जापानी सेना का आक्रमण हुआ था । उन्हें चुंगकिंग के ब्रिटिश दूतावास भेज दिया गया लेकिन वे चीनी विश्वविद्यालयों की ओर फरार होने में कामयाब रहे ।
    वे अंग्रेजी कविता के प्रोफेसर और नौसैनिक वास्तुकला के जिंहुुआ विश्वविद्यालय, कनमिंग में लेक्चरर रहे । जापानी युद्ध की समाप्ति के बाद वे माओत्से-तुंग से कई बार मिले ।
    विश्वयुद्ध के बाद उनका अधिकतम समय अमरीका में ही गुजरा । इस बीच वे एशिया महाद्वीप की यात्राएँ भी करते रहे । वे दो बार बांगला देश की यात्रा पर गए, कई बार शेख मुजीबुर्रहमान से मुलाकातें की और बांगला देश के अधिकतर हिस्सों को यात्राएँ की ।
    रॉबर्ट पेन ने हिटलर, लेनिन, महात्मा गाँधी की जीवनियों के लेखक के रूप में विश्व-भर में ख्याति अर्जित की ।
    निधन सन् 1983 ।

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