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Aranya Gatha

Aranya Gatha

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  • Pages: 135p
  • Year: 2000
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171195792
  •  
    1968 से 1975 तक खेतिहर आबादी, सामंतवादी शोषण, वर्ण-विरोध और तमाम दूसरी असंगतियों से जुड़ा एक विशाल साहित्य बंगाल में सामने आया । ' 75 के बाद हिन्दी, तेलुगु व मराठी में भी यह अन्तर्ध्वनि तेज हुई । शैवाल की कहानियों के लेखन की यह सामान्य पृष्ठभूमि है । यह दूसरी बात है कि इस वृहत्तर पृष्ठभूमि में शैवाल का अपना संसार भी झाँकता है । शैवाल की कहानियों में अलग-अलग स्थितियाँ ही नहीं हें, अलग-अलग हलचलें हैं । अलग-अलग छाया-ध्वनियाँ हें, भीतर के संसार के अलग-अलग शेड्‌स हैं और एक ऐसी रूढ़िमुक्त भाषा है जो अपने चरित्रों की बोलियों से परहेज नहीं करती । शैवाल ने सामान्य जन की कहानियाँ भी लिखी हैं और बिहार के उन्हीं सामान्य लोगों को विशिष्ट बनाकर भी ढेर सारी कहानियाँ लिखी हैं । इन कहानियों का मूल राग एक ही है और वह आदिम राग भी है, जिसे मैं हिन्दुस्तान का केन्द्रीय अन्तर्विरोध मानता हूँ । शैवाल की इन कहानियों में गाँव की दुनिया पर बढ़ते हुए दबावों की यंत्रणा है, असंगठित-साधनहीन फिर भी परिस्थितियों से जूझते हुए स्त्री-पुरुष हैं तथा छोटे-छोटे समुदायों के भीतर का आतंक है । इनमें 'मरुयात्रा' का कष्ट भरा अनुभव और वह मारक आतंक भी. है, जिससे घिरा हुआ परमेसरा कहता है, 'सुक्को कुओं में कूद गई, मालिक ।' सूचना चाहे बड़ी न हो, पर सुअर की तरह रीं-रीं कर उसका रोना क्या इस घटना से बाहर जाकर हमें कुछ और सुनने के लिए बाध्य नहीं करता? -डॉ: सुरेन्द्र चौधरी

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    Shaival

    शैवाल

    जन्म: 23 फरवरी, 1949 में बेलछी के पास बाढ़ अनुमंडल में।

    अनुभव: पिछले 35 वर्षों से कविता, कहानी, रपट व समीक्षा आदि का लेखन।

    प्रकाशित पुस्तकें: समुद्रगाथा, मरुयात्रा, दामुल और अन्य कहानियाँ, दामुल: उपन्यासिका और अन्य कहानियाँ, सुप्रभा के घर में घोड़ा और अरण्य गाथा (सभी कहानी-संग्रह)।

    पत्रकारिता: रविवार साप्ताहिक के लिए ‘गाँव’ कॉलम का लेखन। पत्रिका ‘कथाबोध’ व ‘इन्दु’ का सम्पादन।

    अनुवाद: रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद।

    पुरस्कार: कथा-लेखन के लिए 1989 में ‘रेणु पुरस्कार’ एवं ‘गंगाशरण सिंह पुरस्कार’ से सम्मानित।

    फिल्म: 1984 में सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फिल्म ‘दामुल’ के लिए कथा, स्क्रिप्ट एवं संवाद-लेखन; जयवंत दलवी के मराठी नाटक पर आधारित फिल्म ‘पुरुष’ के लिए स्क्रिप्ट एवं संवाद-लेखन; फिल्म ‘मृत्युदंड’ की कथा के लिए सर्वश्रेष्ठ कथा की श्रेणी में सनसुई दर्शक अवार्ड के लिए नामित; दंगे पर लिखित कविताओं का उपयोग राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म ‘फेसेज आफ्टर द स्टार्म’ में।

    पता: एम.आई.जी. 65, शहीद भगतसिंह कालोनी, गया (बिहार)।

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