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Jahan Lakshmi Quaid hai

Jahan Lakshmi Quaid hai

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  • Pages: 166p
  • Year: 2017, 6th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788171196913
  •  
    साहित्य की धारा जहाँ मोड़ लेकर सारे परिदृश्य को नया कर देती है, निश्चय ही वहां कुछ रचनाएँ होती हैं ! जहाँ लक्ष्मी कैद है ऐसी ही एक कहानी है ! ‘नई कहानी’ आन्दोलन की एक आधार-कथा रचना के रूप में जहाँ लक्ष्मी कैद है का उल्लेख किए बिना स्वतंत्रता के बाद की हिंदी कहानी को नहीं समझा जा सकता ! स्वतंत्रता ने जिन सपनों को जगाया था, उन्हें आपसी संबंधो में तिलमिल कर टूटते देखना, महसूस करना और लिखना हिंदी कहानी को नया स्वरुप दे रहा था ! समबंधो, मानसिकताओं और भाषा में उतरती द्वान्द्वात्म्क्ता में अकेला, अनसमझा व्यक्ति मोहभंग की त्रासदी का साक्षात् प्रतीक है ! हालाँकि ‘नई कहानी’ का प्रारम्भ प्रतीक (संपादक अज्ञेय) के अगस्त, 1951 के अंक में प्रकाशित राजेंद्र यादव की कहानी खेल-खिलोने से माना जाता है, मगर जहाँ लक्ष्मी कैद है नई कहानी-आन्दोलन का अनिवार्य कथा-संग्रह है ! इसी संग्रह में है एक कमजोर लड़की की कहानी नाम की दूसरी बेहद चर्चित कहानी ! लंच टाइम और रौशनी कहाँ है जैसे कहानियां सिर्फ एतिहासिक दृष्टि से ही महत्तपूर्ण नहीं हैं, वे आज भी प्रासंगिक हैं ! जहाँ लक्ष्मी कैद है संग्रह को पढना एक पीढ़ी के मानसिक इतिहास से होकर गुजरना है !

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    Rajendra Yadav

    राजेन्द्र यादव

    जन्म : 28 अगस्त, 1929, आगरा। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), 1951, आगरा विश्वविद्यालय।

    प्रकाशित पुस्तकें : देवताओं की मूर्तियाँ, खेल-खिलौने, जहाँ लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, ढोल और अपने पार, चौखटे तोड़ते त्रिकोण, वहाँ तक पहुँचने की दौड़, अनदेखे अनजाने पुल, हासिल और अन्य कहानियाँ, श्रेष्ठ कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियाँ (कहानी-संग्रह); सारा आकाश, उखड़े हुए लोग, शह और मात, एक इंच मुस्कान (मन्नू भंडारी के साथ), मंत्र-विद्ध और कुलटा (उपन्यास); आवाज तेरी है (कविता-संग्रह); कहानी : स्वरूप और संवेदना, प्रेमचन्द की विरासत, अठारह उपन्यास, काँटे की बात (बारह खंड), कहानी : अनुभव और अभिव्यक्ति, उपन्यास : स्वरूप और संवेदना (समीक्षा-निबन्ध-विमर्श); वे देवता नहीं हैं, एक दुनिया : समानान्तर, कथा जगत की बागी मुस्लिम औरतें, वक्त है एक ब्रेक का, औरत : उत्तरकथा, पितृसत्ता के नए रूप, पच्चीस बरस : पच्चीस कहानियाँ, मुबारक पहला कदम (सम्पादन); औरों के बहाने (व्यक्ति-चित्र); मुड़-मुडक़े देखता हूँ... (आत्मकथा); राजेन्द्र यादव रचनावली (15 खंड)।

    प्रेमचन्द द्वारा स्थापित कथा-मासिक ‘हंस’ के अगस्त, 1986 से 27 अक्टूबर, 2013 तक सम्पादन। चेखव, तुर्गनेव, कामू आदि लेखकों की कई कालजयी कृतियों का अनुवाद।

    निधन : 28 अक्टूबर, 2013

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