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Gangatat

Gangatat

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  • Pages: 158p
  • Year: 1999
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171194591
  •  
    आज के महत्त्वपूर्ण हिन्दी कवियों की पंक्ति में ज्ञानेन्द्रपति का होना कविता की कुछ विरल किस्में ईजाद करने वाले एक ऐसे कवि का होना है जिसे दुनिया की हर वस्तु काव्य-संभावना से युक्त लगती है। ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं में जनपदीय आभा है, स्थानीयता का गौरव है, आंचलिकता की उजास है तथा जीवन और जगत को मथने-भेदनेवाले समकालीन मुद्दों की अनिवार्य अनुगूँज है। वे अपने पसंदीदा कवियों के यहाँ जिस जीवन-द्रव्य की मौजदूगी की बात करते हैं, उनकी कविताओं में उसकी भ्भरपूर उपस्थिति महसूस की जा सकती है। वस्तुनिष्ठता की शर्तों पर कविता की एकरस रीतिबद्धता से अलग राह बनाते हुए ज्ञानेन्द्रपति ने अपने जीवनावलोकनों से बहुधा मनुष्य को केंद्र में रखते हुए अनेक चरित्रों, पदार्थों, स्थितियाँ एवं मानवीय उपस्थितियों में परकाया-प्रवेश किया है। एक दौर में जहाँ राजनीतिक तेवर वाली कविताएँ ही विशेषकर कवियों की पहचान के लिए रेखांकित की जाती थीं, ज्ञानेन्द्रपति ने कविता को निरे राजनीतिक प्रवाह में बहने न देकर उसे अपनी कवि-प्रतिभा से अपने समय की मानवीय कार्रवाई में बदलने का आह्वान किया। ज्ञानेन्द्रपति के लिए कविता कवि की कथनी नहीं, करनी है। इस सदी की कालांकित और कालजयी-सिद्ध होने वाली कविता लिख रहे ज्ञानेन्द्रपति वस्तुत: निराला और मुक्तिबोध की सजग कवि-चेतना के प्रतिनिधिक कवि के रूप में उभरे हैं। ज्ञानेन्द्रपति के कवि की विशिष्टता इस बात तक सीमित नहीं है कि उन्होंने वस्तुनिष्ठता के साथ अपने समय के अनुभवों को कविता में साधा-सिरजा और बहुवस्तुस्पर्शी बनाया है बल्कि इसलिए भी है कि किसी अलौकिक या धार्मिक सत्ता पर आस्तिकता/आस्था का कंधा टिकाए बगैर भारतीय जीवन-संस्कृति के मूलाधारों को कवितालोकित कर उन्होंने हमारे इस विश्वास को ही पुख्ता किया है कि भारतीयता से छिन्नमूल होकर एक भारतीय कवि का अपना रचनाधार जैसे-तैसे भले ही बन जाए किन्तु उसका जनाधार व्यापक नहीं हो सकता। इस संक्रांति-वेला में अपने समय-समाज की चिन्हारी के लिए ही नहीं बल्कि उद्वेलित करने वाले उरा आनन्द के लिए भी, जो भोषिक सृजनात्मकता के बल पर कविता के ही दिए-किए सम्भव है, इस संकल्र की कविताएँ हिन्दीभाषी जनता द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी पढ़ी जाएँगी। आवरण चित्र : दीप्तिप्रकाश मोहन्ति

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    Gyanendrapati

    जन्म: बिहार के झारखंड क्षेत्र के एक गाँव पथरगामा में।

    प्रकाशित रचनाएँ

    कविता-संग्रह: आँख हाथ बनते हुए (1970), शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है (1980)। काव्य-नाटक: एकचक्रानगरी।

    निवास: बी-3/12, अन्नपूर्णानगर, काशी विद्यापीठ मार्ग, वाराणसी।

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