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Katha Samay

Katha Samay

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  • Pages: 119p
  • Year: 2002
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171198058
  •  
    समय अगर किसी रचना की कसौटी है, तो आलोचना की कसौटी भी वही है। कालबद्ध होकर ही ये दोनों कालजयी हो पाती हैं। लेकिन आलोचना-कर्म की एक कसौटी यह भी है कि अपने समय के रचना-कर्म को वह खुली आँखों से देखे और पूर्वग्रहमुक्त होकर उसकी पड़ताल करे। इस संदर्भ में डॉ. विजयमोहन सिंह का आलोचना-कर्म शुरू से ही पाठकों का ध्यान आकर्षित करता रहा है। ‘आज की कहानी’ के बाद यह उनकी दूसरी ऐसी कृति है, जिसमें उन्होंने सिर्फ कथा साहित्य को केंद्र में रखा है, और कहानी एवं कहानीकारों के साथ-साथ उपन्यास और उपन्यासकारों पर भी विचार किया है। इसके लिए उन्होंने ‘कथा-परिदृश्य: एक’ और ‘कथा-परिदृश्य: दो’ के अंतर्गत चौदह रचनाकारों को लिया है; और आकस्मिक नहीं कि एक समर्थ कथाकार के रूप में रघुवीर सहाय भी इनमें शामिल हैं। यह सही है कि आलोचना की सम्पन्नता रचना की सम्पन्नता पर निर्भर है, लेकिन आलोचक की अपनी दृष्टि-सम्पन्नता के बिना इस बात का कोई महत्त्व नहीं है। संदर्भतः लेखक के ही शब्दों को उद्धृत करें तो ‘‘जिस तरह हम रचना या रचनाकारों का मूल्यांकन करते हैं, उसी तरह अपने विचारों को भी एकत्र रूप में प्रस्तुत करते हुए यह परखना जरूरी है कि वे केवल संग्रहीत पृथक-पृथक निबंध न लगें, बल्कि जिनमें हमारी अपनी निजी जीवन-दृष्टि भी झलके।’’ दूसरे शब्दों में, एक सजग समालोचक आलोचना ही नहीं, आत्मालोचना भी करता है और इसी अर्थ में उसके इस काम को रचनात्मक कहा जाता है। कहना न होगा कि डॉ. विजयमोहन सिंह की इस कृति में यह गुण इसलिए और अधिक है, क्योंकि वे स्वयं एक समर्थ कथाकार हैं और एक बोलती हुई आलोचना- भाषा के सहारे रचना की मूल्यवत्ता और उसे उजागर करनेवाली सचाई तक जाने का साहस रखते हैं।

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    Vijay Mohan Singh

    विजयमोहन सिंह

    जन्म: 1 जनवरी, 1936 को शाहाबाद (बिहार) में।

    शिक्षा: एम.ए., पी-एच.डी.।

    कार्यक्षेत्र की दृष्टि से 1960 से 1969 तक आरा (बिहार) के डिग्री कॉलेज में अध्यापन। अप्रैल, 1973 से 1975 तक  दिल्ली  विश्वविद्यालय  के  रामलाल  आनन्द महाविद्यालय में अध्यापन। अप्रैल, 1975 से 1982 तक हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में सहायक प्रोफ़ेसर। 1983 से 1990 तक भारत भवन, भोपाल में ‘वागर्थ’ का संचालन। 1991 से 1994 तक हिन्दी अकादमी, दिल्ली के सचिव।

    1964 से 1968 तक पटना से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘नई धारा’ का सम्पादन। नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित यूनेस्को कूरियर के कुछ महत्त्वपूर्ण अंकों तथा एन.सी.ई.आर.टी. के लिए राजा राममोहन राय की जीवनी का हिन्दी अनुवाद।

    प्रकाशन: पाँच आलोचना पुस्तकें; टट्टू सवार, एक बंगला बने न्यारा, ग़मे हस्ती का हो किससे...!, चाय के प्याले में गेंद नामक चार कहानी-संग्रह। कोई वीरानी-सी वीरानी है...(उपन्यास)। 1960 के बाद की कहानियों का एक चयन और उसका सम्पादन। हिन्दी की प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में 100 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित।

    संप्रति: स्वतंत्र लेखन।

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