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Koi Veerani Si Veerani Hai

Koi Veerani Si Veerani Hai

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  • Pages: 101p
  • Year: 1998
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171194079
  •  
    यह 'वीरानी' किसकी है? दिल का, दिमाग के। ?भ । एफ पूरे परिवेश की? .. .उपन्यास लेकिन वीरानी' की तलाश नहीं है । तलाश है इस वीराने में अर्थ की । प्रतिभा और परिवेश सब बंजर हो रहे है । प्रतिभाएँ या तो कुंठित हो रही है या अपनी वहशत में क्रमिक हत्याओं तथा आत्महत्याओं की ओर उग्रसर! एक तीसरा रास्ता है : अपनी चतुर, कुटिल बुद्धि का लिप्सा में लिथड़ा भोगलिप्त उपयोग । यह कथा इन तीनों पथों के पथिकों की एक स्थाली पुलाक् न्याय' जानकारी देती है । एक सामूहिक अक्षमता है जो हर कहीं जाकर अवरुद्ध हो जाती है : चाहे वह सफलता का रास्ता हो, सुविधाओं के संसार का या संबंध, साहचर्य और प्रेम के निर्वाह का । .. .आज का आदमी या तो सिनिकल है या ऐसा समझदार जो हर शिकार के बाद एक तताजामछली' की तलाश में है लेकिन हर मछली एक मरी हुई मछली' है । . ..यह एक संस्कृति की कहानी भी है जो कला और प्रचलन में फर्क करना भूल गई है । यह वीरानी उस विविधता की भी है क्योंकि जितनी विविधता होगी, उतनी ही वीरानी बढ़ेगी । संकेतों, प्रतीकों तथा प्रयोजनार्थ निर्मित नाटकीय कथास्थितियों में मित कथन को माध्यम बनाकर लिखा गया यह उपन्यास अपने व्यंजनार्थ में ही सबकुछ व्यक्त करने की चेष्टा है । सहज तथा सरल-सी प्रतीत होनेवाली इस कथा में एक काल' है जो अपनी बंजरता में विस्तृत होता जा रहा है : एक सामंती युग के अवशेष का अत तो दूसरी ओर तथाकथित आधुनिक का अनुभव, अनुभूति का स्पर्शहीन अनवरत स्थानान्तरण : कस्बा, नगर, महानगर तथा परदेश-गमन की दिशाहीन यात्राओं की ओर! इन्हीं सबके इस सर्वव्यापी 'आइसबर्ग' के महज एक नाखून का रेखांकन है यह! कम से कम दिखने और अधिक से अधिक दिखाने का प्रयास! इसीलिए इसमें सायास कुछ नहीं है : जो है वह दृश्य' में । व्याख्याओं, विश्लेषणों तथा स्थापनाओं के रूप में कुछ नहीं! एक व्यक्तिगत, सामूहिक, सामाजिक अथवा सांकृतिक वीरानी अपने बयान' में ही व्यक्त हो सकती हैं-व्याख्या या बड़बोलेपन में नहीं!

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    Vijay Mohan Singh

    विजयमोहन सिंह

    जन्म: 1 जनवरी, 1936 को शाहाबाद (बिहार) में।

    शिक्षा: एम.ए., पी-एच.डी.।

    कार्यक्षेत्र की दृष्टि से 1960 से 1969 तक आरा (बिहार) के डिग्री कॉलेज में अध्यापन। अप्रैल, 1973 से 1975 तक  दिल्ली  विश्वविद्यालय  के  रामलाल  आनन्द महाविद्यालय में अध्यापन। अप्रैल, 1975 से 1982 तक हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में सहायक प्रोफ़ेसर। 1983 से 1990 तक भारत भवन, भोपाल में ‘वागर्थ’ का संचालन। 1991 से 1994 तक हिन्दी अकादमी, दिल्ली के सचिव।

    1964 से 1968 तक पटना से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘नई धारा’ का सम्पादन। नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित यूनेस्को कूरियर के कुछ महत्त्वपूर्ण अंकों तथा एन.सी.ई.आर.टी. के लिए राजा राममोहन राय की जीवनी का हिन्दी अनुवाद।

    प्रकाशन: पाँच आलोचना पुस्तकें; टट्टू सवार, एक बंगला बने न्यारा, ग़मे हस्ती का हो किससे...!, चाय के प्याले में गेंद नामक चार कहानी-संग्रह। कोई वीरानी-सी वीरानी है...(उपन्यास)। 1960 के बाद की कहानियों का एक चयन और उसका सम्पादन। हिन्दी की प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में 100 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित।

    संप्रति: स्वतंत्र लेखन।

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