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Aaj Ki Kahani

Aaj Ki Kahani

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  • Pages: 155p
  • Year: 2002
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 817119804x
  •  
    आज की कहानी अगर रचना और आलोचना, दोनों को एक नयी प्राण-प्रतिष्ठा देती जान पड़े तो आश्चर्य नहीं। ज़हीन, संवेदनशील और जागरूक कथाशिल्पी विजयमोहन सिंह ने यहाँ जिस लगाव और शिद्दत के साथ शब्दों के अर्थ और अर्थ के संदर्भों की तलाश की है, यह उसका स्वाभाविक परिणाम है। प्रामाणिकता, प्रासंगिकता, भोगा हुआ यथार्थ, रूमानीपन, फ़ैंटेसी और रूपक जैसे तमाम शब्द रोज़मर्रा आलोचना में निरर्थक ढंग से फेंके जाते रहे हैं। पर हिन्दी के कथा-साहित्य और उससे जुड़े हमारे देश-काल के व्यापक बुनियादी सवालों से मुठभेड़ होने पर वे यहाँ कुछ और ही रंग-रूप में सामने आते हैं। शिल्प, कला-रूपों, जीवन-दर्शनों की इस गंभीर, दायित्वपूर्ण लेकिन जानदार पड़ताल में विजयमोहन सिंह की मूलतः मार्क्सवादी दृष्टि कठमुल्लापन, खे़माबंदी या सरलीकृत वर्गीकरण की धुंध से मुक्त है। इसलिए इन समीक्षात्मक निबंधों को भी किसी बने-बनाये खाँचे में रखना मुश्किल है। तिलमिला देने की हद तक तीखी यह उधेड़-बुन नुस्ख़ों, नक्क़ाल मूढ़ताओं, भोथरे इकहरेपनों, अतिनाटकीयताओं और छद्म गंभीरताओं पर भारी पड़ती है। यह बेलौसपन अपने समय की सच्चाई को जीने की ईमानदार कोशिश है, और जहाँ भी लेखक को कुछ मूल्यवान लगा है, उसे रेखांकित करने में संकोच नहीं है। एक तरह से यह हिन्दी कहानी की वर्णमाला है: प्रेमचंद से लेकर नई कहानी, अ-कहानी और साठोत्तरी कहानी तक का परिदृश्य। एक ऐसा परिदृश्य, जिसमें उपस्थित- अनुपस्थित, प्रिय या अप्रिय महत्त्वपूर्ण कथाकार कहीं-न- कहीं एक-दूसरे से, अपने समय और परंपरा से, भाषा- रचना-अभिव्यक्ति-चिंतन के धरातल पर टकराते हैं, जुड़ते-टूटते हैं। इन संबंध-सूत्रों की बारीकियाँ, और नितांत नये कोणों से कृती और कृतित्व को परखने की कसौटियाँ आज की कहानी में मिलेंगी। उम्मीद शायद ग़लत न हो कि इससे केवल विवाद की नहीं, एक नये संवाद की भी शुरुआत होगी। - गिरधर राठी

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    Vijay Mohan Singh

    विजयमोहन सिंह

    जन्म: 1 जनवरी, 1936 को शाहाबाद (बिहार) में।

    शिक्षा: एम.ए., पी-एच.डी.।

    कार्यक्षेत्र की दृष्टि से 1960 से 1969 तक आरा (बिहार) के डिग्री कॉलेज में अध्यापन। अप्रैल, 1973 से 1975 तक  दिल्ली  विश्वविद्यालय  के  रामलाल  आनन्द महाविद्यालय में अध्यापन। अप्रैल, 1975 से 1982 तक हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में सहायक प्रोफ़ेसर। 1983 से 1990 तक भारत भवन, भोपाल में ‘वागर्थ’ का संचालन। 1991 से 1994 तक हिन्दी अकादमी, दिल्ली के सचिव।

    1964 से 1968 तक पटना से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘नई धारा’ का सम्पादन। नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित यूनेस्को कूरियर के कुछ महत्त्वपूर्ण अंकों तथा एन.सी.ई.आर.टी. के लिए राजा राममोहन राय की जीवनी का हिन्दी अनुवाद।

    प्रकाशन: पाँच आलोचना पुस्तकें; टट्टू सवार, एक बंगला बने न्यारा, ग़मे हस्ती का हो किससे...!, चाय के प्याले में गेंद नामक चार कहानी-संग्रह। कोई वीरानी-सी वीरानी है...(उपन्यास)। 1960 के बाद की कहानियों का एक चयन और उसका सम्पादन। हिन्दी की प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में 100 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित।

    संप्रति: स्वतंत्र लेखन।

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