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Upanyaso Ke Sarokar

Upanyaso Ke Sarokar

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  • Pages: 120p
  • Year: 2012
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183615235
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    मेरे जैसे अध्येता के लिए यह कालावधि भूमंडलीकरण के प्रभाव की सबसे भयावह अवधि रही है। वह इसलिए कि विश्व व्यवस्था के इस नए परिवर्तन का प्रभाव अपने विविध रूपों के साथ खुलकर सामने आने लगा है; यहाँ तक कि उसने वैचारिक धरातल से नीचे उतरकर जमीनी सच्चाई को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। आज का आदमी एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जिसमें इतिहास और संस्कृति ही नहीं बल्कि वर्तमान से भी उसका रिश्ता अरूप होता चला जा रहा है। यह कम दुर्भाग्य की बात नहीं है कि इतिहास, विचार और साहित्य से लेकर मूल्यों तक की घोषणाएँ की जा रही हैं और हम उन घोषणाओं की वास्तविकता को परखने के बदले उनकी व्याख्या और बहस के लम्बे-चौड़े आयोजन करने में लगे हुए हैं। इस दौर में स्त्री, दलित और जनजातीय समाज लगातार बहस के केन्द्र में अपनी जगह बना रहे हैं। माना जा रहा है कि यह उत्तराधुनिकता से प्रेरित एक ऐसी परिघटना है, जिसमें पूरी सक्रियता के साथ जड़ों की ओर लौट रहे हैं तथा विकेन्द्रित परिस्थितियों का निर्णय करके अपने यथार्थ को समझने की कोशिश कर रहे हैं। स्त्री, दलित और जनजाति तीनों ने ही पूरी व्यवस्था के सामने कुछ असहज सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनमें कुछ इन वर्गों की पहचान से जुड़े हैं और कुछ इनकी स्वाधीनता, निर्णय के सम्मान और इनके स्वीकार से सम्बन्धित हैं। इसी सबके चलते पिछले वर्षों में मैंने विचार के स्तर पर अपने को सक्रिय भी अनुभव किया और परेशान भी। मुझे सोचने के लिए नए-नए रास्ते दिखाई दिए हैं। - भूमिका से

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    Dr. E. Vijaylaxmi

    डॉ. ई. विजयलक्ष्मी

    जन्म: 1971; मोइराङ्खोम, इम्फाल (मणिपुर)।

    श्री एलाङ्बम याइमा सिंह व श्रीमती सुमो देवी की कनिष्ठ सन्तान।

    शिक्षा: प्राथमिक शिक्षा केन्द्रीय विद्यालय लम्फेल से। वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान से हिन्दी साहित्य में एम.ए. तथा मणिपुर विश्वविद्यालय से ‘प्रमुख साठोत्तरी हिन्दी उपन्यासों का अध्ययन’ विषय पर पी-एच.डी.।

    रचना-कर्म: साहित्य से प्रारम्भिक जीवन से ही लगाव। मौलिक लेखन, समीक्षा-परक लेखन आदि के साथ ही अनुवाद में विशेष रुचि। मान्यता यह कि अनुवाद के माध्यम से भाषायी व साहित्यिक समृद्धि तथा व्यापक सामाजिक संवाद के लिए ठोस कार्य किया जा सकता है। ‘भाषा’ तथा ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में अनूदित कहानियों एवं कविताओं का प्रकाशन। मणिपुर से प्रकाशित हिन्दी पत्रिकाओं से जुड़कर साहित्य-सेवा का प्रयत्न। डॉ. चों. यामिनी देवी की कहानियों का अनुवाद - ‘पर्वत के पार’ पुस्तकाकार प्रकाशित।

    सम्पर्क: मोइराङ्खोम, लोकलाओबुङ्, बोकुलमखोङ्, इम्फाल - 715001 (मणिपुर)।

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