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Man Akela Ho Gaya Hai

Man Akela Ho Gaya Hai

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  • Pages: 100p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183616591
  •  
    भावनाओं से भरा इनसान शायरी न करे तो क्या करे! विजय जोशी बड़े जज़्बाती इनसान हैं। हर बात उन्हें छू जाती है, रोज़ मर्रह की जि़न्दगी में, सुबह की हवा और सूरज की पहली किरन से लेकर, दिन डूबने और चाँद निकलने तक, वोह हर लम्हे से भिड़ते हुए गुजरते हैं। उन्हें सचमुच जीना आता है। इसीलिए जज़्बात पल-पल बुलबुलों की तरह उठते हैं और वोह उन्हें टूट जाने से पहले पकड़ लेना चाहते हैं। कविता के कटोरे में आ जाएँ तो बच जाते हैं वरना बह जाते हैं और फिर अगला दिन... दोस्त उस दिन तीस साल बाद तुम्हारे सफेद हो रहे बालों ने कही समय के थपेड़ों की कई कहानियाँ और मेरे चश्मे के नम्बर में छुपी थीं गुज़रे पलों की निशानियाँ विजय क्योंकि बाकायदा शायरी नहीं करते, यानी मेरी तरह येह उनके लिए ज़रया-ए-रोज़गार नहीं है। लेकिन गमे-रोज़गार के लिए बाकायदा लिखते रहते हैं अखबारों में, रिसालों में और खतों में। मैं उनके शायराना खुतूत हासिल कर चुका हूँ। उनकी नज़्में निजी लगती हैं लेकिन वह इतनी निजी हैं नहीं। एक जागी हुई चेतना और मुकम्मिल Social consciousness का एहसास देती हैं। वह अपना चौगिरदह लफ्जों से पेंट करते हैं, लेकिन ल$फ्ज़ों के वक्$फों में इतना कुछ लिख देते हैं कि उसमें इतिहास नज़र आने लगता है। एक कोताहिये 'ज़मीर'— कल रात मेरा ज़मीर मर गया— मर तो शायद काफी पहले गया था... मैंने इस एहसास को, आत्मा तक उतरने नहीं दिया। आखिर अपनों की मौत से कौन समझौता कर पाया है!वोह अपना माज़ी और वरसे में मिली धरती और उसकी सुन्दरता बयान करते हैं और उनमें छोटे-छोटे चित्र भी उनकी जि़न्दगी का हिस्सा रहे हैं। स्कूल के पीछे इमली का पेड़ खेतों की कोरों पर मिट्टी की मेड़ सब गुम हो गया मेरे बच्चो, मैं तुमसे शर्मिंदा हूँ विरासत के नाम पर छोड़ कर जाऊँगा उजड़ी सी धरती, स्याह आसमान। विजय जितनी CASUALLY लिखते हैं उतने ही गौर से पढऩे के $काबिल हैं, क्योंकि इस सादगी के पीछे एक नेहायत जि़म्मेदार की आत्मा जाग रही है।

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    Vijay Joshi

    Vijay

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