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Media Jantantra Aur Atankvad

Media Jantantra Aur Atankvad

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  • Pages: 215p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171198228
  •  
    ग्यारह सितम्बर की सुबह दो अमेरिकी टॉवरें ही नहीं गिरीं, मीडिया की ‘बाइनरी’ यानी ‘विलोमवाची मीडिया’ टावरें भी गिर गईं। ग्यारह सितम्बर के बाद का मीडिया एक किस्म के विकेन्द्रण की चपेट में है। अब एक मामूली-सा अरबी चैनल अलजजीरा सी.एन.एन. पर भारी है। मीडिया का कंटेंट अब ‘पहचान के चिह्नों’ को, उसके ‘भावकों’ को सक्रिय करता है और वे ही पलटकर उसका कंटेंट बनाते हैं। आप स्टूडियो में जो बनाते हैं वही कंटेंट नहीं होता। जो उसे रिसीव करता है, ग्रहण करता है वह अपना कंटेंट बनाता है। यह एक प्रकार की उत्तर- संरचनावादी अनेकार्थता है जो मीडिया बनाने लगा है और जो नजर आने लगी है। आतंकवाद जनतन्त्र का विलोम है। वह स्वयं किसी जनतन्त्र को नहीं मानता। न उसे बने रहने देना चाहता है। ऐसे में यदि जनतन्त्र स्वयं ही सिकुड़ने लगे या कि उसे सत्ता सिकोड़ने लगे तो आतंकवाद को ही ताकत मिलती है। शुरू में लग सकता है कि आतंकवादी जनतन्त्र का लाभ उठा रहे हैं, उन्हें रोकना चाहिए। चूँकि मीडिया अब तक सत्ता संवलित जनतन्त्र पर पलता आया है और उसने आतंकवाद को हमेशा ऑफिसियल नजर से देखा है इसलिए वह उसे न दिखाने में यकीन किया करते हैं। इससे आतंकवाद की साख बढ़ती है, बिन लादेन का मिथक्करण इसी कारण है। तब क्या करें ? इस मामले में बाबा तुलसीदास हमारे बड़े काम के हैं और अपने चैनलों को तुलसीदास का रावण-वर्णन इन दिनों जरूर पढ़ना चाहिए। आतंकवाद सूचना की पकड़ से बाहर रहस्य बनकर सूचना बनता है। उसे और बाहर कर देने से उसी की मदद होती है। आतंकवाद मीडिया युग की राजनीतिक कार्रवाई है। उसका भूत मीडिया ही उतार सकता है। वह जितना सूचना में रहेगा उतना ही संवाद में रहेगा। जितना संवाद में रहेगा उतना ही जनतन्त्र में आकर सहज बनेगा।

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    Sudhish Pachauri

    सुधीश पचौरी

    जन्म : 29 दिसंबर, 1948; अलीगढ़ (उ.प्र.)।

    शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी, आगरा विश्वविद्यालय), पीएच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टोरल शोध (हिन्दी, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली)।

    दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर। अब सेवा-निवृत्त।

    माक्र्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तंभकार, मीडिया-विशेषज्ञ, भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित।

    प्रकाशित पुस्तकें : नई कविता का वैचारिक आधार; कविता का अंत; निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद; दूरदर्शन की भूमिका; दूरदर्शन: स्वायत्तता और स्वतंत्रता (सं.); नए जन-संचार माध्यम और हिन्दी (सं.); उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; दूरदर्शन : दशा और दिशा; नामवर के विमर्श (सं.); दूरदर्शन : विकास से बाजार तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक विमर्श; मीडिया और साहित्य; उत्तर-केदार (सं.); देरिदा का विखंडन और साहित्य; साहित्य का उत्तरकांड : कला का बाजार; टीवी टाइम्स; इक्कीसवीं सदी का पूर्वरंग; अशोक वाजपेयी : पाठ-कुपाठ; प्रसार भारती और प्रसारण-परिदृश्य; साइबर-स्पेस और मीडिया; स्त्री देह के विमर्श; आलोचना से आगे; हिन्दुत्व और उत्तर-आधुनिकता; मीडिया, जनतंत्र और आतंकवाद; ब्रेक के बाद; बिंदास बाबू की डयरी; पॉपूलर कल्चर; फासीवादी संस्कृति और सेकूलर पॉप-संस्कृति; साहित्य का उत्तर-समाजशास्त्र आदि।

    सम्प्रति : वाक् त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन।

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