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Main Ghumakkar Vanon Ka

Main Ghumakkar Vanon Ka

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  • Pages: 138p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171198686
  •  
    शिकार की कहानियाँ वनप्राणियों के जीवन को ही नहीं, बल्कि वनों के परिवेश और उनकी भिन्न-भिन्न स्थितियों को भी प्रदर्शित करती हैं । मनुष्य और जानवर, समय और स्थान तथा अन्य सब घटनाएँ जो शिकारी को वन-जीवन के निकट ले जाती हैं और किसी भी शिकार कथा का अभिन्न अंग हैं । जानवर का पीछा करने का अपना ही आनन्द है जिसके विचार मात्र से शिकारी की आँखों के सामने जंगल के अत्यन्त सुन्दर दृश्य नाचने लगते हैं, जैसे घने वृक्षों के नीचे धरती पर पड़ी उनकी गहरी और ठंडी छाया, प्रभात के शान्तिमय वातावरण में तूफानी सागर की मतवाली लहरों की भाँति चारों ओर गूँजती शेरों की ऊँची एवं गहरी गर्जनाएँ हाथियों की तुरही-की-सी आवाजें, शोरगुल मचाते हुए जंगली सीड, मस्त चाल से चलता हुआ भालू चोरों की तरह बिना ध्वनि किए छिप-छिपकर चलता हुआ बघेरा, द्रुत गति से भागते हुए साम्बर, शान से गर्दन उठाकर चलते हुए चीतल, एक-दूसरे के पीछे से अस्पष्ट दिखाई देती हुई पहाड़ियों के ऊपर इधर-उधर बिखरे हुए घास के मैदान और उन पहाड़ियों के पीछे बर्फ से ढके पहाड़ जिनमें यह सब कुछ मानो खो-सा जाता है । शिकार की इन कहानियों में लेखक ने अपने अनुभवों का यथासम्भव सही-सही वर्णन करने का प्रयास किया है । साथ ही अपने साथियों और जंगल में घटी घटनाओं का उल्लेख करते समय, उन्होंने उनसे प्राप्त सुख व दुख, प्यार और सहानुभूति के अनुभवों को भी अपने विवरणों का हिस्सा बनाया है ।

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    Sherjung

    शेरजंग
    जन्म: 27 नवम्बर, 1904। शिक्षा: अधिकतर स्वशिक्षण। अंग्रेजश्ी, हिन्दी, उर्दू, फषरसी, बांग्ला और जर्मन भाषाओं के ज्ञाता।
    जीवन की मुख्य घटनाएँ: आरम्भ से बहिर्मुखी और घुमक्कड़ प्रवृत्ति के धनी शेरजंग एक जमींदार परिवार में पैदा होने के बावजूद युवावस्था मेें ही जमींदारी के खिलाफष् हो गए थे। किशोरावस्था से ही वे स्वतन्त्राता-आन्दोलन में शरीक हो गए जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेजी सरकार ने उन्हें फाँसी की सजश सुनाई जो बाद में चलकर आजीवन कारावास में बदल गई। मई, 1938 में रिहाई और उसी वर्ष शादी। 1940 में पुनः गिरफ़्तार। 1944 में रिहाई और देश को स्वतन्त्राता मिलने तक दिल्ली की सिविल लाइंस में नज़रबन्द।
    स्वतन्त्राता-प्राप्ति के बाद 1947-48 में शरणार्थी शिविरों का आयोजन। कश्मीर मिलीशिया का संगठन किया और कर्नल की मानद उपाधि से सम्मानित हुए। बंगाल में दंगों के दौरान साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए कार्य किया। गोवा मुक्ति आन्दोलन में संलग्न रहे।
    प्रकाशित कृतियाँ: लोरजा (कविता संग्रह); लाइफष् एंड टीचिंग आॅफष् कार्ल माक्र्स, हिस्ट्री आॅफष् कम्युनिस्ट रशिया, ट्रिस्ट विथ टाइगर, रैंबलिंग इन टाइगरलैंड, गनलोर, प्रिजश्न डेजश् और उर्दू में एक उपन्यास। अप्रकाशित रचनाएँ: गशलिब और हाफिष्जश् की गश्जश्लों के हिन्दी रूपांतरण, दस स्पेक जरथुस्त्रा। हिन्दी में: कारावास के दिन तथा शेरों से मेरी मुलाकातें।
    निधन: 15 दिसम्बर, 1996।

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