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Muktibodh Ki Kavya Srishti

Muktibodh Ki Kavya Srishti

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  • Pages: 127p
  • Year: 2004
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171199747
  •  
    आधुनिक हिन्दी काव्य-साहित्य के इतिहास में निराला के बाद मुक्तिबोध एक ऐसे कवि के रूप में सदैव याद किए जाएँगे जिनका जीवन ही उनकी कविता होती है । जिसकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता है । मुक्तिबोध के काव्य का निर्माण चेतना को झकझोर देने वाले अन्तःसंघर्ष, उनके अभिशप्त युग तथा व्यक्तित्व के संधान से उपजा है । वस्तुत: उनकी कविताओं का पेचीदापन इसी अन्तःसंघर्ष की उपज है । लेकिन अपने युग को अर्थ और वाणी देने से अधिक और क्या सार्थक कार्य कोई कवि कर सकता है! मुक्तिबोध का काव्य इस चुनौती को स्वीकार करता है तथा अपने युग की भयावहता को पूर्णता के साथ रूपायित भी करता है । यह सच है कि मुक्तिबोध एक प्रतिबद्ध कवि हैं लेकिन उनकी प्रतिबद्धता को किसी वाद-विशेष से जोड़कर ही यदि देखा जाता रहा तो यह उनकी काव्य-प्रतिभा के साथ अन्याय ही होगा । वस्तुत: उनकी प्रतिबद्धता तो वैश्विक स्तर पर श्रमशील मानव के प्रति ही रही है । प्रस्तुत पुस्तक मुक्तिबोध की काव्य संवेदना को इसी दृष्टिकोण से समझने का प्रयास है ।

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    Suresh. Rituparna

    डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण

    जन्मपत्री के अनुसार सन् 1949 में मथुरा में जन्म।

    दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए., एम.लिट. एवं पी-एच.डी. की उपाधि। ‘नयी कविता में नाटकीय तत्‍व’ विषय पर शोधकार्य।

    सन् 1971 से 2002 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में अध्यापन।

    1988 से 1992 तक ट्रिनीडाड एवं टुबैगो स्थित भारतीय हाई कमीशन में राजनयिक के रूप में प्रतिनियिुक्त।

    सन् 1999 से 2002 तक मॉरिशस स्थित महात्मा गांधी संस्थान में ‘जवाहरलाल नेहरू चेयर ऑफ इंडियन स्टडीज’ पर अतिथि आचार्य के रूप में कार्य।

    ‘मुक्तिबोध की काव्य-सृष्टि’ व ‘हिन्दी की विश्व यात्रा’ सहित कई पुस्तकें प्रकाशित। सन् 1980 में प्रथम कविता-संग्रह ‘अकेली गौरैया देख’ प्रकाशित एवं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत।

    अमेरिका, जापान, कनाड़ा, ट्रिनीडाड, सूरीनाम, गयाना, फीजी, मॉरिशस, फ्रांस, जर्मनी, इटली आदि के अतिरिक्त यूरोप के अनेक देशों की यात्राएँ एवं दीर्घ प्रवास।

    ‘विश्व हिंदी न्यास’ (न्यूयॉर्क, अमेरिका) के अंतरराष्ट्रीय समन्वयक एवं त्रैमासिक पत्रिका ‘हिंदी जगत’ के प्रबंध सम्पादक।

    विदेशों में हिंदी प्रचार-प्रसार के लिए भारतीय विद्या संस्थान, ट्रिनीडाड द्वारा ‘ट्रिनीडाड हिंदी भूषण सम्मान’। हिंदी फाउंडेशन ऑफ ट्रिनीडाड एवं टुबैगो द्वारा ‘हिंदी निधि सम्मान’ एवं उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा वर्ष 2004 में ‘विदेश हिंदी प्रचार सम्मान’ द्वारा सम्मानित।

    जापान के ‘तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज’ में प्रोफेसर पद पर भी कार्य।

    ई-मेल सम्पर्क: mrituparna52@hotmail.com

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