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Pashchatya Sahitya Chintan

Pashchatya Sahitya Chintan

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  • Pages: 194p
  • Year: 2017, 9th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788171190188
  •  
    पश्चिम में साहित्य-चिंतन की सुदीर्घ परंपरा को हिंदी के पाठकों के लिए प्रमाणिक और सहज ग्राह्य रूप में सुलभ कराने की दिशा में प्रस्तुत ग्रन्थ एक महत्त्पूर्ण प्रयास है ! प्लेटो से बीसवीं शताब्दी तक पाश्चात्य काव्य-चिंतन में योगदान देनेवाले सभी महत्त्पूर्ण विचारकों और प्रवृत्तियों का प्रमाणिक विवेचन इस रचना की विशेषता है; अकादमिक अनुशासन से एक साथ युक्त और मुक्त विश्लेषण-पद्दति इसका प्रमुख आकर्षण है ! ग्रन्थ की सामग्री का आधार मूल स्रोत है ! बकौल प्लेटो : सत्य के अनुकरण का अनुकरण ग्रन्थ की विश्वसनीयता तथा लेखिका की प्रतिबद्धता का कारण भी यही है ! प्रस्तुत कृति से इस विषय के सुधि पाठकों की बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति होगी !

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    Dr. Nirmala Jain

    हिन्दी की जानी-मानी आलोचक निर्मला जैन का जन्म सन् 1932 में दिल्ली के व्यापारी परिवार में हुआ। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण आरम्भिक जीवन संघर्षपूर्ण रहा। इसके बावजूद उन्होंने दिल्ली में ही शिक्षा पूरी की और वर्षों कत्थक गुरु अच्छन महाराज (बिरजू महाराज के पिता) से नृत्य की शिक्षा प्राप्त की। विवाह से पहले बी.ए. तक और विवाह के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से ही उन्होंने एम.ए., पी-एच.डी. और डी.लिट् की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

    लेडी श्रीराम कॉलेज (1956-70) और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग (1970-96) में अध्यापन करके सेवानिवृत्त होने के बाद भी, वे विशेष आमंत्रित रूप से दस वर्ष तक अध्यापन करती रहीं। इस दौरान वे हिन्दी विभाग की अध्यक्ष (1981-84) और अनेक वर्ष तक दक्षिण-परिसर में विभाग की प्रभारी प्रोफेसर रहीं।

    अध्यापन के दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अनेक महत्त्वपूर्ण आलोचना कृतियों की रचना की और प्रसिद्ध कृतियों के अनुवाद किए। महादेवी और जैनेन्द्र की रचनावलियों के अतिरिक्त कई पुस्तकों का संचयन और सम्पादन भी किया। इन मौलिक, अनूदित और सम्पादित रचनाओं की संख्या तीस से अधिक है। अपने जीवन और समय का जायज़ा उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘ज़माने में हम’ में लिया है।

    निर्मला जैन एक ऐसा सुपरिचित नाम हैं जिन्होंने अपनी वस्तुनिष्ठ आलोचना-दृष्टि और बेबाक अभिव्यक्ति से हिन्दी के पुरुष-प्रधान आलोचना-परिदृश्य में उल्लेखनीय जगह बनाई है। उनके अनेक शिष्य महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।

    खास बात यह है कि आज भी वे पूरी लगन और निष्ठा से अध्ययन और रचना-कर्म में संलग्न हैं और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान दे रही हैं।

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      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
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