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Popular Culture

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  • Pages: 207p
  • Year: 2004
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: PC240
  •  
    'पॉपुलर कल्वर' सम्बन्धी कुछ लेख एवं टिप्पणियाँ यहाँ संकलित हैं : 'पॉपूलर कल्वर' का हिन्दी में निकट अनुवाद 'लोकप्रिय संस्कृति' हो सकती है 1 लेकिन 'पॉपूलर कल्वर' का आशय विशिष्ट है । पाठक उसे इन टिप्पणियों में पाएँगे । पश्चिमी समाजों में साहित्याध्ययनों के साथ सांस्कृतिक अध्ययनों का आरम्भ काफी पहले हुआ था । 'पॉपुलर कल्वर' के अध्ययन भी शुरू हुए और अब 'कल्चरल स्टडीज' या कहें सांस्कृतिक अध्ययन ज्यादा स्वीकृत हैं । देर-सबेर हिन्दी में भी शुद्ध साहित्यिक अध्ययन- अध्यापन की जगह साहित्य को व्यापक सांस्कृतिक अध्ययनों की कोटियों के तहत देखा-परखा जाने लगेगा । कुछ वरस पहले हिन्दी कथा मासिक 'कथादेश' में 'पॉप-कल्वर' नाम से कॉलम शुरू किया । धीरे-धीरे पाठकों ने उसे पढ़ना-सराहना शुरू कर दिया । साठ हजार करोड़ रुपए के आसपास आकलित भारतीय मनोरंजन उद्योग में दिन-रात बननेवाली भारतीय 'पॉप कल्वर' का 'ग्लोबल बाजार' है । फिर विश्वभर में दिन-रात बननेवाली तरह-तरह की 'पॉप कल्चर' के अनन्त रूप टीवी आदि माध्यमों के जरिए यहां भी पर्याप्त उपलब्ध रहते हैं । इन दिनों सभी समाज एक प्रकार के 'सांस्कृतिक सरप्लस' एवं 'मिक्स' में रहते हैं । भारतीय समाज में तो यह और भी ज्यादा है । अपना समाज इन दिनों 'सांस्कृतिक राजनीति' के दौर में है । नए सांस्कृतिक मोड़ जीवन को गहरे प्रभावित करते हैं । नए-नए तनाव बिनु और संघर्ष के क्षण बनते रहते हैं । संस्कृति इस तरह एक नया 'समरांगण' है । 'पॉपूलर कल्वर' के अध्ययन इन्हें समझने में मदद करते हैं । आनेवाले दिनों में 'सांस्कृतिक अध्ययन' और भी निर्णायक बनेंगे । हिन्दी में तत्ववाद और कट्‌टरतावाद का वर्चस्व है । मनोरंजन को 'पाप' समझा जाता है । पॉप-कल्वर को 'पश्चिमी', 'साम्राज्यवादी' अप-संस्कृति कहा जाता है । यह किताब इस समझ को निरस्त करती है । यह 'पॉप कल्वर' को एक ऐतिहासिक घटना मानकर उसके कुछ प्रमुख स्वरूपों, चिह्नों और घटनाओं का अध्ययन करती है ।

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    Sudhish Pachauri

    सुधीश पचौरी

    जन्म: 29 दिसंबर, 1948; अलीगढ़ (उ.प्र.)।

    शिक्षा: एम.ए. (हिंदी, आगरा विश्वविद्यालय), पी-एच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टोरल शोध (हिंदी, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली)

    मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तंभकार, मीडिया-विशेषज्ञ, भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित।

    चर्चित पुस्तकें: नई कविता का वैचारिक आधार; कविता का अंत; दूरदर्शन की भूमिका; दूरदर्शन: स्वायत्तता और स्वतंत्रता (सं.); उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; दूरदर्शन: दशा और दिशा; नामवर के विमर्श (सं.); दूरदर्शन: विकास से बाजार तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक विमर्श; मीडिया और साहित्य; उत्तर-केदार (सं.); देरिदा का विखंडन और साहित्य; साहित्य का उत्तरकांड: कला का बाजार; टीवी टाइम्स; इक्कीसवीं सदी का पूर्वरंग; अशोक वाजपेयी पाठ-कुपाठ; प्रसार भारती और प्रसारण- परिदृश्य; साइबर-स्पेस और मीडिया; स्त्री देह के विमर्श; आलोचना से आगे; हिन्दुत्व और उत्तर-आधुनिकता; मीडिया, जनतंत्र और आतंकवाद; ब्रेक के बाद; पॉपूलर कल्चर, फासीवादी संस्कृति और सेकूलर पॉप-संस्कृति, साहित्य का उत्तर-समाजशास्त्र।

    सम्प्रति: दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर।

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