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Pramod Verma Samagra Vol. (1-4)

Pramod Verma Samagra Vol. (1-4)

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Regular Price: Rs. 2,800

Special Price Rs. 2,520

10%

  • Year: 2009
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183613422
  •  
    भावोन्माद, इतिहास लेखन, बिसारने और नकारने की कलाबाजी, मूल्यांकन–अन्वेषण में अजगरी वृत्ति, पहचान की नादानियाँ, समकालीनों के मध्य अति और अविवेकी प्रतिस्पर्धा, कथित वरिष्ठों और प्रतिष्ठानों के फतवों पर अनन्याश्रय या अन्धभक्ति कदाचित् बीसवीं सदी में हिन्दी साहित्य संसार की सबसे बड़ी खामियाँ रही हैं । इन खामियों के अँधेरों ने जिन प्रकाश–स्तम्भों को लीलने की असफल कोशिशें की हैं उनमें महत्त्वपूर्ण नाम हैµप्रमोद वर्मा । प्रमोद वर्मा का रचनात्मक समय उन तीन–चार दशकों तक विस्तारित है जहाँ वे मुक्तिबोध, हरिशंकर परसाई, श्रीकान्त वर्मा के समानान्तर खड़े हैं, उन तीनों के साथ अंतरंगता के बावजूद अपनी पृथक और मौलिक पहचान के साथ और कई मामलों में अधिक दीप्ति के साथ । शायद इसलिए भी कि वे हिन्दी के उन विरले आलोचकों में हैं जो सिद्धान्तों के सामान्यीकरण को रचना के सन्दर्भ में कारगर नहीं मानते । यह कम बड़ी बात नहीं कि मुक्तिबोध के परम मित्र लेखक होने के बाद भी वे मुक्तिबोध के ज्ञानात्मक संवेदना को भी निजी भूगोल, निजी संस्कृति, और निजी आत्मा की कसौटी पर बाँधते हैं । 19वीं और 20वीं सदी के प्रमुख काव्य मूल्यों वाले पाश्चात्य तथा बहुभाषिक पाठों और विचारों की गम्भीर अध्ययनशीलता उनकी सर्जनात्मक दृष्टि पर हावी न हो सकी और उनकी आलोचना पर सर्जना का अंकुश सदैव बना रहा । और यह सच भी है कि कोई बगैर सर्जक हुए आलोचक नहीं हो सकता । उनकी कविता की पड़ताल करें तो वे छायावादोत्तर कवियों के मध्य अविचल मौन खड़े दिखाई देते हैं जिनके मूल्यांकन से हमने जान–बूझकर मुँह मोड़ लिया है । उनके बारे में अत्यल्प शब्दों में कहें तो वे बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक थे । कभी उन्हें नाटक लुभाता था तो कभी निबन्ध और कविता तो वे आलोचना के समानान्तर ही लिखते रहे । ‘‘प्रमोद वर्मा समग्र’’ के रूप में वर्मा जी की रचनाओं को चार खंडों में विन्यस्त किया गया है । इस पहले खंड में ‘साहित्य–रूप और सृजन–प्रक्रिया के सन्दर्भ’, ‘अंग्रेजी की स्वच्छन्द कविता’, ‘रोमान की वापसी’ और ‘हलफनामा’ जैसी आलोचनात्मक कृतियों को समादृत किया गया है, जिनके बिना हिन्दी आलोचना की सम्पूर्ण पड़ताल बेमानी होगी ।

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    Vishva Ranjan

    विश्व रंजन

    जन्म: 1 अप्रैल, 1952

    शिक्षा: पटना विश्वविद्यालय से बी.ए. (ऑनर्स) करने के बाद भारतीय पुलिस सेवा में चयन।

    स्वत्व: शादी-शुदा और दो लड़कियों के पिता, मशहूर शायर फ़िराक़्$ गोरखपुरी के नाती।

    सेवाएँ:

    1973: आईपीएस (म.प्र./छत्तीसगढ़ कैडर)।

    1974-1985 तक उज्जैन, रीवा, जावरा (रतलाम), ग्वालियर, रायगढ़, भोपाल, बस्तर, रायपुर में विभिन्न पदों पर।

    1985-2006: भारत सरकार में प्रतिनियुक्ति पर विभिन्न महत्त्वपूर्ण पदों एवं आन्तरिक सुरक्षा कार्यों में दिल्ली, गुजरात, बिहार में पदस्थ।

    राष्ट्रीय सुरक्षा महाविद्यालय में एक वर्ष।

    प्रधानमन्त्री के सराहनीय पुलिस सेवा तथा राष्ट्रपति के विशिष्ट सेवा पदकों से सम्मानित।

    अभिरुचि: कविता लिखने के अलावा पेंटिंग तथा फ़ोटोग्राफ़ी, कला तथा संस्कृति के विभिन्न आयामों पर लेखन।

    प्रकाशन: देश की लगभग सभी महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में समादृत।

    कृतियाँ: स्वप्न का होना बेहद जरूरी (कविता संग्रह); एक नई पूरी सुबह (एकाग्र-सम्पादने - जयप्रकाश मानस); प्रमोद वर्मा समग्र (सम्पादित, चार खंडों में)

    अनुवाद: अंग्रेजी, बांग्ला, पंजाबी, तेलुगु में कविताएँ अनूदित, स्वप्न का होना बेहद जरूरी है का तेलुगु में अनुवाद।

    विदेश यात्राएँ: इंग्लैंड, इटली, जर्मनी, हॉलैंड, फिनलैंड, डेनमार्क, चेकोस्लोवाकिया, साउथ अफ्रीका, मॉरीशस, अमेरिका आदि।

    प्रकाश्य: कविता संग्रह एवं उपन्यास।

    सम्प्रति: पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़।

    सम्पर्क: सी-2/15, शान्ति नगर, रायपुर,

    छत्तीसगढ़-492001, मोबाइल: 9981551000

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