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Radio Natak Ki Kala

Radio Natak Ki Kala

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  • Pages: 174p
  • Year: 2018, 5th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171190871
  • ISBN 13: 9788171190874
  •  
    रेडियो नाटक की कला सन् 1988 के ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार’ से सम्मानित है। डॉ. सिद्धनाथ कुमार रेडियो नाटकों के जाने-पहचाने लेखक और अध्येता हैं। सन् 1948 से ही ये रेडियो नाट्य-लेखन से जुड़े हैं। सन् 1955 में प्रकाशित इनकी पुस्तक रेडियो नाट्य शिल्प काफी चर्चित हुई। अनेक लेखक और अध्येता इस नई विधा की प्रथम पुस्तक से लाभान्वित हुए। रेडियो नाटक की कला में लेखक ने अपने दीर्घकालीन नाट्य-लेखन के अनुभव एवं विषयगत व्यापक अध्ययन के आधार पर रेडियो नाट्य विधा का सूक्ष्म एवं व्यापक विवेचन किया है। रेडियो नाटक के व्यावहारिक लेखन और सैद्धान्तिक अध्ययन, दोनों ही दृष्टियों से पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसा हमारा विश्वास है। डॉ. सिद्धनाथ कुमार नाट्यालोचक भी हैं और इन्होंने रेडियो नाटकों के प्रसंग में वस्तु-विन्यास, चरित्र, संवाद आदि का जो विवेचन किया है, वह सामान्य नाटक के शिल्प में रुचि रखने वाले लेखकों और अध्येताओं के लिए भी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगा।

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    Siddhanath Kumar

    सिद्धनाथ कुमार

    जन्म: 13 अगस्त, 1927, बक्सर (बिहार)।

    शिक्षा: एम.ए., पी-एच.डी, डी.लिट्.।

    सेवा-कार्य: कुछ कॉलेजों में अध्यापन, आकाशवाणी के पटना केंद्र मेें नाटक-लेखक और सहायक प्रोड्यूसर। सन् 1962 से निरंतर राँची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रहे। वहीं से प्रोफेसर पद से अगस्त, 1989 में सेवानिवृत्त।

    कृतियाँ: प्रसाद के नाटकों का पुनर्मूल्यांकन, हिंदी एकांकी की शिल्पविधि का विकास, हिन्दी एकांकी, रेडियो नाट्य- शिल्प, वार्ता-शिल्प, रेडियो नाटक की कला, हिंदी पद्यनाटक: सिद्धांत और इतिहास, संवेदना और शिल्प; समीक्षा-शृंखला की पाँच पुस्तकों में: आधे-अधूरे (मोहन राकेश), अंधेर नगरी (भारतेंदु), भारतदुर्दशा (भारतेंदु), चंद्रगुप्त (प्रसाद) और स्कंदगुप्त (प्रसाद) का अध्ययन।

    टूटा हुआ आदमी और जिन्दगी, तुम कहाँ हो? (काव्य); कवि, सृष्टि की साँझ और अन्य काव्यनाटक, रंग और रूप, वे अभी भी क्वाँरी हैं, आदमी है नहीं है, मुर्दे जिएँगे, रोशनी शेष है, आतंक, रास्ता बंद है और अशोक (नाटक)।

    कमाल कुर्सी का, चमचे वही रहे, मिले सुर मेरा-तुम्हारा, मियाँ-बीवी राज़ी तो, देशभक्ति की जय (व्यंग्य)।

    जीवनचरित, बालसाहित्य की अनेक पुस्तकें। हिंदी साहित्य कोश, हिंदी साहित्य का बृहत् इतिहास आदि अनेक संदर्भ ग्रंथों में टिप्पणियाँ और लेख।

    पुरस्कार और सम्मान: सन् 1954 में वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सर्विस द्वारा आयोजित रेडियो रूपक प्रतियोगिता में एक रूपक सर्वश्रेष्ठ पुरस्कृत। नाट्य कृतियों के लिए

    बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, राधाकृष्ण पुरस्कार, रामवृक्ष बेनीपुरी पुरस्कार (राजभाषा विभाग, बिहार)ए भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार (सूचना और प्रसारण मंत्रालय) आदि द्वारा सम्मानित।

    संपर्क: आलोक, हेसल, राँची-834 005 (झारखंड)

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