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Rajya Sarkar Aur Jansampark

Rajya Sarkar Aur Jansampark

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  • Pages: 166p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171198473
  •  
    लोकतान्त्रिक मूल्यों की महत्ता को देखते हुए 'लोक' और 'जन' अभिव्यक्तियाँ किसी भी संगठन या गतिविधि को सम्मान दिलाने के लिए कारगर विशेषण या उपसर्ग बन जाती हैं । कई बार ये अभिव्यक्तियाँ सम्मान का स्थान प्राप्त करने का औजार मात्र बनकर रह जाती हैं । उसकी मूल भावना का नितान्त अभाव सम्बन्धित संगठन या गतिविधि में होता है । भारतीय संविधान में सरकार के लिए जो भूमिका निर्धारित की गई है उसके चलते, वैश्वीकरण की धी के बावजूद सरकार आनेवाले बहुत समय तक समाज की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण संस्था के रूप में स्थापित रहेगी । सच कहा जाए तो सरकार की भूमिका का दायरा बढ़ता ही जा रहा है, बहुत बार सही ढंग से तथा कई बार प्रश्नास्पद तरीके से । यह प्रवृत्ति भारत की तरह अन्य लोकतान्त्रिक विकासशील देशों में भी जारी रहेगी, तेज भी हो सकती है, पर घटेगी नहीं । समाज पर बाजार के हावी होने की कोशिश के बावजूद राज्य की महत्ता के अक्षुण्ण रहने के परिप्रेक्ष्य में समाचार के क्षेत्र में सरकार के सम्पर्क में आनेवाले, सरकार से जूझनेवाले और सरकार में सेवा करनेवाले सभी प्रकार के लोगों के लिए निश्चय ही विशेषज्ञ लेखकों द्वारा तैयार यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी । काली दत्त झा : स्व. काली दत्त झा का जन्म तत्कालीन बस्तर रियासत की राजधानी जगदलपुर में 21 अप्रैल 193० को हुआ । उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा उसी नगर में हुई । मध्यप्रदेश हायर सेकेण्डरी एजूकेशन बोर्ड से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद '.श्री झा ने सागर विश्वविद्यालय से बीएससी. और नागपुर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की । श्री झा ने जनसम्पर्क का विशेष प्रशिक्षण भारतीय जनसंचार संस्थान में प्राप्त किया । उन्होंने बम्बई और मेलबोर्न में आयोजित विश्व जनसम्पर्क सम्मेलनों में भी भाग लिया । सुनाय प्रसाद तिवारी : रघुनाथ प्रसाद तिवारी ने संचार व सम्पर्क की यात्रा राजनीतिक भूमिगत कार्यकर्ताओं के बीच 'संदेश वाहक' बनने से शुरू की । विद्यार्थी आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी के साथ सभी राजनीतिक दलों की गतिविधियों और अधिवेशनों में अनिवार्य उपस्थिति । विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में फुटकर लेखन । 1 जनवरी, 195० को नवभारत के जबलपुर संस्करण के सम्पादकीय विभाग में सहायक सम्पादक पद पर नियुक्ति के साथ नियमित पत्रकारिता का प्रारम्भ । सन् 1951 में एम.ए. (अर्थशास्त्र) । वर्ष 80 से 86 तक संयुक्त संचालक के रूप में समाचार शाखा का प्रभार । , इस बीच पत्रकारिता और जनसम्पर्क की अनेक प्रशिक्षण एवं दिशादर्शन कार्यशालाओं में भागीदारी और अनेक कार्यशालाओं का संचालन । डी. महेन्द्र मधुप : डी. महेन्द्र मधुप पिछले करीब तीन दशकों से जनसम्पर्क के कार्य से सम्बन्धित हैं । डी. मधुप ने कृषि क्षेत्र से सम्बन्धित जनसम्पर्क अभियान में विशेष दक्षता अर्जित की है । डी. मधुप मूलत: साहित्यिक होने के बावजूद प्रतिबद्ध पत्रकारिता से निरन्तर जुड़े रहे हैं । राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता में पीएचडी. प्राप्त करने के पश्चात् डी. मधुप ने सामाजिक सरोकारों का प्रतिनिधित्व करने वाली पत्रिकाओं -असत्ता!, राष्ट्रधर्म पब्लिक पिनियन आदि) का भी सम्पादन किया, और पिछले कई वर्षो से राजस्थान के प्रमुख दैनिक नवज्‍योति में मीडिया पर नियमित रूप से कॉलम भी लिख रहे हैं । देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता-जनसंचार-जन- सम्पर्क विभागों के अकादमिक कामों से सम्बद्ध ।

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    Kalidutt Jha

    KaliduttJha

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