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Ras Chintan Ke Vividh Aayam

Ras Chintan Ke Vividh Aayam

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  • Pages: 223p
  • Year: 1997
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171193153
  •  
    तमाम विरोधों और आक्षेपों के बावजूद रस-सिद्धांत काव्‍यचिंतकों के लिए गंभीर चुनौती बना रहा है । नई रचना-प्रवृत्‍तियों के साथ टकराव उसे सदियों से संपन्न और समृद्ध करता आया है । लेकिन आधुनिक काल में नई जुमीन पर नए तेवर के साथ उगी-बड़ी कविता ने औग् काव्यबोध की आधुनिक प्रज्ञा ने रचना-कर्म और काव्यास्वाद की जिन नई समस्याओं को जन्म दिया है उन्होंने इम सिद्धांत को आमूल हिला दिया है । 'आधुनिक भारतीय भाषाओं में कमोबेश सभी में इस उथल-पुथल और परिवर्तन के आसार दीख पड़े । हिंदी 'और मराठी में अपेक्षाकृत कुछ अधिक ही । उसमें भी मराठी दार्शनिकों, सौंदर्यशास्त्रियों, समाजवार्दा चिंतकों, काव्यालोचकों और स्वयं रचनाकारों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से रस-सिद्धांत की तराश और जाँच-परख की पहल करके न केवल बहुआयामी चिंतन के लिए दिशा-द्वार उमुक्त कर दिए बल्कि भरत के नाट्‌यशास्त्र' के मूल पाठ की तहों तक जाकर उन्होंने भरत की उस वस्तुनिष्ठ दृष्टि को भी उजागर कर दिया जिस पर अभिनवगुप्त की 'अध्यात्मवादी दार्शनिकता का गहरा रंग चढ़ा हुआ था । यह एक अत्यंत साहसिक और क्रांतिकारी कदम था । कदम वह भी उतना ही क्रांतिकारी था जिसने अपने समय की कविता की धड़कनों को अनुभव कग्के क्रांति और प्रक्षोभ जैसे नए रसों की स्वीकृति को जन्‍म दिया । औग् वह भी जिसने भिन्न रसों की झीनी और मटमैली पड़ गई चादर को एकबारगी हटाकर प्रखर 'भावगंध' से पूरे वातावरण को झकझोर डाला । प्रस्तुत संकलन के लेखों से गुजरना जलती मशाल की रोशनी में स्वतंत्र मेधा के इतिहास के पन्नों से गुजरना है । मराठी रस-विचारकों की उस अंत प्रज्ञा का सीधा साक्षत्कार-सुख अनुभव करना है, जिसकी ऊष्मा का अनुभव हमने अभी तक प्राय: पराये स्रोतों मे और बड़े संक्षिप्त रूप में किया है । रस-चिंतन के विविध आयामों को उद्‌घाटित करनेवाले मूल मराठी मे अनूदित ये लेख अपना पूर्णता में उपस्थित होकर अब भी हिंदी में पुनर्विचार और नए संवाद का रास्ता खोल सकते हैं । इनकी शक्ति और संभावनाएं अभी भी जीवित हैं ।

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    Anandprakash Dikshit

    डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित
    जन्म : माघ शुक्ल द्वितीया. वि. स. 1980, मेरठ (ग् .प्र.)
    शिक्षा : एम. ए. हिंदी) '4 9, एम. ए. (संस्कृत) '5 1, पीएच .डी. (हिंदी) '5 6 । जीवन-वृत्ति : स्नानकोत्तर अध्यापन तथा शोध-निर्देशन ( गोरखपुर '49. '62. जयपुर '6 2 - '66, पुणे '66 - ' 85 तथा ' 89 - 'शा । पूना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में 1966 से 1985 तक आचार्य तथा अध्यक्ष पद पर काम करने के उपरांत 1985 में अवकाश-प्राप्ति । 1957 से शोध निर्देशक ।
    विशेषज्ञता : साहित्यशास्त्र. सौंदर्यशास्त्र. पाठसंपादन तथा काव्यालोचन । फल. अंग्रेजी. बँगला. मराठी तथा गुजराती काव्यशास्त्र का विशेष अध्ययन । सम्मान -सदस्यता : विद्याभूषण, साहित्यभारती, साहित्यवाचस्पति'; श्रेष्ठ शिक्षक पुकार आदि पुरस्कारों से सम्मानित; भारतीय हिंदी परिषद; हिंदी पारिभाषिक शब्दावली समिति, मध्य रेलवे; उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान; दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई : कर्णधार परिषद्, महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी, मुंबई; तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों, 'अकादमियों से विभिन्न स्तरों पर संबद्ध; विजिटिंग प्रोफेसर ।
    विदेश यात्रा : जर्मनी तथा यूरोप के सात देशों में भ्रमण ।
    लेखन : 1939 से विभिन्न हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशन ( कविता, कहानी, निबंध से प्रारंभ 1 तथा दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित ।
    वर्तमान पद : 1989 से इमैरिटस प्रोफेसर, हिंदी विभाग, पुणे विद्यापीठ । पूर्ण-. 11०७ (महाराष्ट्र) ।

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