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Rashtriya Swayamsevak Sangh Aur Usaki Vichardhara

Rashtriya Swayamsevak Sangh Aur Usaki Vichardhara

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  • Pages: 82p
  • Year: 2006
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8183610315
  •  
    ‘‘...राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आम लोगों के लिए आज भी एक रहस्य ही है। यह वह संगठन है जिसे महात्मा गांधी की हत्या का अभियुक्त बताया गया था, जिसने 6 दिसम्बर, 1992 को सरेआम बाबरी मस्जिद को ढहाकर भारत की राष्ट्रीय एकता की जड़ों को झकझोर कर रख दिया। फिर भी, इस संगठन का सच आज तक जैसे हजार पर्दों के पीछे छिपा हुआ जान पड़ता है।’’ ‘‘...हमारा प्रश्न है कि क्या सचमुच आर.एस.एस. सिर्फ एक सांस्कृतिक संगठन ही है? चूँकि आर.एस.एस. ने खुद कभी सीधे तौर पर वोट में हिस्सा लेकर सत्ता के लिए अन्य राजनीतिक पार्टियों से प्रतिद्वन्द्विता नहीं की, इसी आधार पर क्या उसे राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से मुक्त एक शुद्ध सांस्कृति संगठन माना जा सकता है? ‘‘...मुसोलिनी से मिलने के बाद मुंजे ने भारत आकर उससे किए गए वादों के अनुसार काम करना शुरू कर दिया। भारत लौटने के बाद ही पुणे के अखबार ‘मराठा’ में उन्होंने एक साक्षात्कार दिया। जिसमें साफ शब्दों में कहा कि ‘‘वास्तव में नेताओं को जर्मनी के बलिल्ला और इटली के फासिस्ट संगठनों का अनुकरण करना चाहिए। मुझे लगता है कि भारत के लिए वे सर्वथा उपयुक्त हैं। यहाँ की खास परिस्थिति के अनुरूप उन्हें अपनाना चाहिए। मैं इन आन्दोलनों से काफी प्रभावित हुआ हूँ और अपनी आँखों से पूरे विस्तार के साथ मैंने उनके कामों को देखा है।’’ ‘‘उल्लेखनीय है कि 31 जनवरी, 1934 के दिन हेडगेवार ने के.वाई. शास्त्राी द्वारा आयोजित फासीवाद और मुसोलिनी के बारे में एक सेमिनार की अध्यक्षता की थी।’’ ‘‘...पूरे स्वतन्त्राता आन्दोलन का इतिहास गवाह है कि इस संगठन ने स्वतन्त्राता पर्व के अपने 22 वर्षों के काल में स्वतन्त्राता की लड़ाई में कोई हिस्सा नहीं लिया। उन्हें ब्रिटिश सरकार का कोप-भाजन बनना कभी गँवारा न था। ‘‘..जातीयता के मामले में संधियों का साफ कहना है कि हिन्दुस्तान में राष्ट्र का अर्थ ही हिन्दू है। गैर-हिन्दू तबकों के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं है। ‘मूलगामी विभेदवाली संस्कृतियों और जातियों का मेल हो ही नहीं सकता’ के हिटलरी फार्मूले को वे भारत पर हूबहू लागू करते हैं।’’ -इसी पुस्तक से

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    Arun Maheshwari

    मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार।

    जन्म: 4 जून, 1951; विज्ञान में स्नातक के बाद दो वर्षों तक कोलकाता विश्वविद्यालय की सीढ़ियों पर कानून की पढ़ाई के लिए टहलकदमी। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव।

    प्रकाशित कृतियाँ: साहित्य में यथार्थ: सिद्धान्त और व्यवहार; आर.एस.एस. और उसकी विचारधारा; नई आर्थिक नीति: कितनी नई; कला और साहित्य के सौन्दर्यशास्त्रीय मानदंड; जगन्नाथ (अनूदित नाटक); जनतंत्र और समाजवाद की समस्याएँ (यंत्रस्थ); मानव विकास के दस विषय (यंत्रस्थ)।

    सम्पर्क: सीएफ-204, साल्टलेक, कोलकाता-700064

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