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Swatantrata Aandolan Ka Itihas (1857-1947)

Swatantrata Aandolan Ka Itihas (1857-1947)

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  • Pages: 139p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183610360
  •  
    स्वतन्त्रता का महापर्व पीड़ा, यातना, त्याग व बलिदान के बीहड़ मार्ग से होकर आया है। इस मार्ग पर लहूलुहान होती, मरती-खपती एक पूरी की पूरी पीढ़ी ने अपना जीवनकाल गुजारा है। न्याय व अधिकार के लिए संघर्षरत पिछली पीढ़ी के साहस, ओज, शक्ति और साथ ही उसकी पीड़ा, यातना, त्याग का ज्ञान अपनी पूरी गरिमा के साथ नई पीढ़ी को होना ही चाहिए। यह संघर्ष उस शक्ति से था जिसके राज्य में सूर्य कभी अस्त ही नहीं होता था। हम विजयी हुए, इसलिए कि पूरा भारत अपनी विभिन्न प्रतिरोधक शक्तियों के साथ उठ खड़ा हुआ। यह युद्ध एक साथ राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक सभी मंचों से लड़ा गया। अंग्रेजों के साथ लड़ते हुए हमने अपनी बुराइयों तथा अपने लोगों से भी युद्ध किया। इस पुस्तक के दादा जी यूँ तो काल्पनिक पात्र हैं, लेकिन यदि कहा जाए कि राष्ट्रीय आंदोलन की आत्मा को उनमें केन्द्रित किया गया है तो झूठ न होगा। उस दौर में अनेक ऐसे लोग थे जिन्होंने आन्दोलन के पीछे रहकर काम किया। साम्राज्यवाद की मार से बिखरे-टूटे परिवार के सदस्यों को सहारा ही नहीं दिया, उन्हें माता-पिता की कमी तक खलने नहीं दी। साम्प्रदायिक दंगों तथा विभाजन के अवसर पर हारे-थके बेसहारा लोगों की रक्षा की। अपने को, अपने व्यक्तिगत सुख, लाभ-हानि को भुलाकर पूरी तरह गांधीवादी विचारधारा में डूब गए। मगर आज वे गुमनामी की दुनिया में खो गए हैं। ऐसी सभी पुण्य आत्माओं को दादा जी के रूप में याद किया गया है। दादा जी के सहारे ही इस इतिहास खंड को कथात्मक रूप दिया जा सका है। जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय स्वतन्त्रता-संग्राम से किशोर पाठकों का भावनात्मक लगाव उत्पन्न हो। वे इस संघर्ष की गौरवमय कथा को जानें, स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करें और आज़ादी के वास्तविक मूल्य को पहचानें। किशोर पाठकों के लिए सरल-सहज भाषा-शैली में लिखी गई यह पुस्तक निश्चय ही चाव से पढ़ी जाएगी, ऐसा हमारा विश्वास है।

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    Shashiprabha Srivastav

    शशिप्रभा श्रीवास्तव जानी-मानी कथाकार हैं। इनके पहले कहानी संग्रह ‘शायद’ को मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने वर्ष 1992-93 के लिए ‘वागेश्वरी’ पुरस्कार से सम्मानित किया। दो वर्ष बाद उनका दूसरा संग्रह ‘तटबंध’ प्रकाशित हुआ।

    उत्तर प्रदेश में जन्मी व शिक्षित शशिप्रभा श्रीवास्तव ने मध्यप्रदेश के गहन आदिवासी क्षेत्रों में कई वर्ष बिताए हैं। इस विविधता को उनकी भाषा, अभिव्यक्तिकरण और विषयवस्तु में सहज ही देखा जा सकता है। आदिवासी मानस व कला पर आपकी अच्छी समझ व पकड़ है।

    यह कहना ज्यादा सही होगा कि उनके लेखन का ज्यादा भाग बच्चों केे हिस्से में जाता है। अब तक बच्चों के नाटक के छह संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

    सम्प्रति आकाशवाणी, भोपाल व दूरदर्शन से सम्बद्ध। बच्चों और महिलाओं के लिए नाटक, कहानी और कविताओं के साथ विभिन्न समस्याओं पर गम्भीर विचार व कार्यक्रम प्रस्तुत किए हैं।

    सम्पर्क: एम-368, गौतमनगर, चेतक ब्रिज के पास, भोपाल (म.प्र.)।

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