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Yadon Ke Bujhe Huye Savere

Yadon Ke Bujhe Huye Savere

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  • Pages: 71p
  • Year: 2007
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183611350
  •  
    यादों के बुझे हुए सवेरे जिंदगी का सफर कठिन भले हो पर है बेहद खूबसूरत। उसे बस जीना आना चाहिए और ज्यादातर लोगों को कमबख्त यह जीना ही नहीं आता। लेकिन लेखक-चित्रकार इस्माइल चुनारा जो बेहद संजीदा, नेकदिल और संवेदनशील इंसान हैं, को इस कला में कमाल हासिल है। पहली बात यह कि उनके दिल और दिमाग दोनों के दरवाजे खुले हैं। सोच और समझ दोनों में समाहित यह खुलापन उनकी शख्सियत का अहम् हिस्सा है। दूसरी यह कि वे जैसा लिखते हैं वैसा ही सोचते हैं और जैसा सोचते हैं उससे अलग जिंदगी वे जीते नहीं। न कोई मिलावट, न कोई बनावट। इसलिए सेक्युलरिज़्म उनके लिए फैशनपरस्ती या मुखौटा नहीं जिसे सुविधा या जरूरत के मुताबिक पहना या उतार दिया। यह उनके जीने का तरीका भी है और सलीका भी। इसकी साफ झलक उनकी कहानियों, कविताओं और नाटकों में दिखाई देती है। ‘यादों के बुझे हुए सवेरे’ में शहंशाह शाहजहाँ का एकालाप, इतिहास के विलाप और पश्चात्ताप की मार्मिक अनुगँूज है जिसे उकेरने में इस्माइल चुनारा के कलाकार हृदय की भूमिका भी कम नहीं। इस्माइल चुनारा के साथ केट का ज़िक्र न किया जाए तो बात अधूरी रह जाएगी। केट उनकी हमसफर ही नहीं हमख़्याल और हमराज़ भी है। जिंदगी के मुश्किल से मुश्किल रास्तों पर साथ देने वाली केट हिम्मत और धीरज का पर्याय है और चुनारा साहब की प्रेरक शक्ति है।

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    Ismail Choonara

    इस्माइल चुनारा का जन्म हालाँकि दक्षिण अफ्रीका में हुआ किन्तु उनका अधिकांश जीवन इंग्लैण्ड में गुज़रा, जहाँ उन्होंने रिसर्च केमिस्ट, गणित-शिक्षक एवं विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। इसी दरमियान उनकी कहानियों, कविताओं एवं अन्य रचनाओं का दक्षिण-अफ्रीका, इंग्लैंड, अमेरिका, भारत व पाकिस्तान की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन एवं उनके विभिन्न नाटकों का बी.बी.सी. एवं जर्मन रेडियो से प्रसारण होता रहा है।

    ‘यादों के बुझे हुए सवेरे’ के अतिरिक्त ‘लैला-मजनूं’, ‘अब ये फ़िज़ा खामोश है’ (गुजरात के नरसंहार पर आधारित) नाटक प्रकाशित।

    सम्प्रति वे मिर्ज़ा ग़ालिब को लेकर एक नाटक पर काम कर रहे हैं।

    आप मूलतः अंग्रेज़ी में लिखते हैं।

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