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Aadi Shankracharya : Jeewan Aur Darshan

Aadi Shankracharya : Jeewan Aur Darshan

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  • Pages: 274p
  • Year: 2008
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180312359
  •  
    आठवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत में जैन धर्म, बौद्ध धर्म तथा अन्य अनेक सम्प्रदायों और मत-मतान्तरों का बोलबाला था ! जैन धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ ! बौद्ध धर्म को खुलकर चुनौती दी ! जैन धर्म भी वैदिक धर्म का कम विरोधी नहीं था ! बौद्ध और जैन धर्मों के अतिरिक्त सातवीं-आठवीं शताब्दी में अन्य धार्मिक संप्रदाय भी प्रचलित हो गए थे ! उनमे भागवत, कपिल, लोकायतिक (चार्वाक), काणाडी, पौराणिक, ऐश्वर, कारणिक, कारंधमिन (धातुवादी), सप्ततान्त्व (मीमांसक), शाब्दिक (वैयाकरण), पान्चेरात्रिक प्रमुख थे ! ये सभी संप्रदाय वेड-विरोधक और श्रुति-निंदक थे ! ऐसी विषम और भयावह स्तिथि में धार्मिक-जगत में किसी ऐसे उत्कट त्यागी, निस्पृह, वीतराग, धुरंधर विद्वान, तपोनिष्ठ, उदार, सर्वगुण-संपन्न अवतारी पुरुष की महान आवश्यकता थी, जो धर्म की विश्रृंखलित कड़ियों को एकाकार करके उसे सुदृढ़ बनाता और धर्म का वास्तविक स्वरुप सबके सम्मुख प्रस्तुत करता ! मधवाचार्य ने शंकराचार्य के अवतार का वर्णन विस्तार के साथ किया है ! उसका सारांश इस प्रकार है : "भगवती भूदेवी और समस्त देवताओं ने जगत-सृष्टा ब्रह्मा के साथ कैलाश पर्वत अपर जाकर पिनाकपाणी आशुतोष भगवान शंकर की आर्त्त वाणी में करबद्ध स्तुति की ! तब भगवान शंकर उन लोगों के सम्मुख अत्यन्त तेजस्वी रूप में प्रकट हुए और उन्हें इस प्रकार आश्वासन दिया : 'हे देवगण, मैं समस्त घटनाओं से भली भांति विज्ञ हूँ ! अतः मैं मनुष्य का रूप धारण कर आप लोगों की मनोकामना पूर्ण करूंगा ! दुष्टाचार विनाश के लिए तथा धर्म के स्थापन के लिए, ब्रह्मसूत्र के तात्पर्य निर्णायक भाष्य की रचा कर, अज्ञानमूलक द्वैतरूपी अन्धकार को दूर करने के लिए मध्यकालीन सूर्य की भांति चार शिष्यों के साथ-चार भुजाओं से युक्त विष्णु के समान इस भूतल पर यतियों में श्रेष्ठ शंकर नाम से अवतरित हूँगा ! मेरे समन्ही आप लोग भी मनुष्य-शरीर धारण कर मेरे कार्य में हाथ बंटाइये !' इतना कहकर और देवताओं को अन्य आवश्यक निर्देश देकर भगवान शंकर अंतर्धान हो गये !" आचार्य शंकर का भारतीय दार्शनिकों में अप्रतिम स्थान है। पाश्चात्य दार्शनिक भी उन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं और उनकी प्रतिभा के सम्मुख अभिनित हैं। उनके बाल्यकाल से देहलीला सँवरण तक की घटनाएँ चमत्कारिक एवं दैवी शक्ति से परिपूर्ण हैं। इसलिए उन्हें भगवान आशुतोष शंकर का अवतार माना जाता है। उन्होंने वैदिक धर्म का पुनरुद्धार किया और उसके वास्तविक स्वरूप को सही अर्थ में समझाने की चेष्टा की। इस महान प्रयास में उन्हें तत्कालीन धर्मों और सम्प्रदायों से लोहा लेना पड़ा। शैवों, शाक्तों, वैष्णवों, बौद्धों, जैनों एवं कापालिकों आदि से शास्त्रार्थ करना पड़ा। अपनी असाधारण प्रतिभा और अकाट्य तर्कों द्वारा उन्हें पराजित किया। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में चार शंकराचार्य को अभिषिक्त कर भारतीय वैदिक संस्कृति के संरक्षण और संवद्र्धन का उत्तरदायित्व उन्हें सौंपा। उन्होंने शैवों, शाक्तों एवं वैष्णवों को एक सूत्र में बाँधा। इससे वैदिक धर्म अत्यन्त शक्तिशाली हो गया। मात्र बत्तीस वर्ष की अल्पायु में उन्होंने अद्वितीय आश्चर्यजनक कार्य किए।

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    Jairam Mishra

    डॉ. जयराम मिश्र
    डॉ. जयराम मिश्र का जन्म सन् 1915 में मुकुन्दपुर, जिला इलाहाबाद में हुआ था । पिता एवं आध्यात्मिक गुरु आत्मज विभूति पं. रामचन्द्र मिश्र ।
    एम.ए., एम-एड, पी-एच.डी., उपाधियाँ प्राप्त करने के उपरांत हिन्दी संस्कृत, अंग्रेजी के साथ-साथ बॉगला और पंजाबी भाषा-साहित्य का गहन
    अध्ययन किया तथा उनके अनेक ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद किया ।
    युवावस्था में स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय रहे । सन् 1942 के आन्दोलन में भाग लेने पर राजद्रोह का मुकदमा चला और छह वर्ष का कारावास भोगा । जेल
    में रहकर आध्यात्मिक ग्रन्थों-गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि का गहन चिन्तन-मनन किया फलत: दिव्य आध्यात्मिक अनुभूतियाँ प्राप्त कीं ।
    इलाहाबाद डिग्री कॉलेज में अध्यापन करते हुए अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया ।
    'श्री गुरुग्रन्थ-दर्शन' तथा 'नानक वाणी' कृतियों ने हिन्दी तथा पंजाबी में स्थायी प्रतिष्ठा प्रदान कीं। जीवनी-ग्रन्थों जैसे गुरु नानक, स्वामी रामतीर्थ, आदि गुरु शंकराचार्य, मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम, लीलापुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण, शक्तिपुज हनुमान ने अपनी कथात्मक ललित शैली, सहज भाषा-प्रवाह तथा स्वयं एक सन्त की लेखनी से प्रणीत होने के कारण अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की ।
    नैतिक ब्रह्मचारी डॉ. मिश्र मूलत: आत्मस्वरुप में स्थित उच्चकोटि के सन्त और धार्मिक विभूति थे । एषणाविहीन, निरन्तर नामजप एवं नित्य चैतान्यमृत, निरन्तर नामजप एवं नित्य चैतान्यमृत में लीन, परम लक्ष्य संकल्पित उनका जीवन आज के युग में एक दुर्लभ उदाहरण है ।
    डॉ. जयराम मिश्र सन् 1987 में पंचतत्व में विलीन हो गये ।
    

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