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Shri Rambhakt : Shaktipunj Hanuman

Shri Rambhakt : Shaktipunj Hanuman

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  • Pages: 229p
  • Year: 2010
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180315091
  •  
    'मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम ने कहा है-लोक पर जब कोई विपत्ति आती है तब वह त्राण पाने के लिये मेरी अभ्यर्थना करता है परंतु जब मुझ पर कोई संकट आता है तब मैं उसके निवारणार्थ पवनपुत्र का स्मरण करता हूँ । अवतार श्री राम का यह कथन हनुमानजी के महान् व्यक्तित्व का बहुत सुन्दर प्रकाशन कर देता है । श्री राम का कितना अनुग्रह है उन पर कि वे अपने लौकिक जीवन के संकटमोचन के श्रेय का सौभाग्य सदैव उन्हीं को प्रदान करते हैं और कैसे शक्तिपुंज हैं हनुमान् कि जो श्री राम तक के कष्ट का तत्काल निवारण कर सकते हैं । भगवान् श्री राम के प्रति अपनी अपूर्व, अद्‌भुत, अप्रतिम, एकांत भक्ति के कारण अन्य की इसी प्रकार की भक्ति का आलंबन बन जाने वाला हनुमान् जैसा कोई अन्य उदाहरण विश्व में नहीं । यही कारण है कि संस्कृत से लेकर समस्त मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं में श्री हनुमान् में परम पावन चरित्र का गान किया गया है और उनके मंदिर भारतवर्ष के प्रत्येक कोने में पाये जाते हैं । इस पुस्तक की रचना में वाल्मीकीय रामायण, अध्यात्म रामायण तथा आनंद रामायण से विशेष सहायता ली गयी है । स्कंदपुराण, पद्‌मपुराणादि एवं महाभारत (वनपर्व) भी रचना में सहायक सिद्ध हुए हैं । गोस्वामी तुलसीदास की कृतियों-रामचरितमानस, विनयपत्रिका, गीतावली, कवितावली एवं कम्बन रचित 'कब रामायण' (तमिल रचना) से भी यत्र-तत्र सहायता ग्रहण की गई है । इनके अतिरिक्त श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र' रचित ' आंजनेय' कल्याण पत्रिका के 'हनुमानांक' ( 1975 ई.) तथा डॉ. गोविन्दचन्द्र राय की पुस्तक 'हनुमान् के देवत्व और मूर्ति का विकास' आदि से भी यथावसर सामग्री प्राप्त की गयी है ।

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    Jairam Mishra

    डॉ. जयराम मिश्र
    डॉ. जयराम मिश्र का जन्म सन् 1915 में मुकुन्दपुर, जिला इलाहाबाद में हुआ था । पिता एवं आध्यात्मिक गुरु आत्मज विभूति पं. रामचन्द्र मिश्र ।
    एम.ए., एम-एड, पी-एच.डी., उपाधियाँ प्राप्त करने के उपरांत हिन्दी संस्कृत, अंग्रेजी के साथ-साथ बॉगला और पंजाबी भाषा-साहित्य का गहन
    अध्ययन किया तथा उनके अनेक ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद किया ।
    युवावस्था में स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय रहे । सन् 1942 के आन्दोलन में भाग लेने पर राजद्रोह का मुकदमा चला और छह वर्ष का कारावास भोगा । जेल
    में रहकर आध्यात्मिक ग्रन्थों-गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि का गहन चिन्तन-मनन किया फलत: दिव्य आध्यात्मिक अनुभूतियाँ प्राप्त कीं ।
    इलाहाबाद डिग्री कॉलेज में अध्यापन करते हुए अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया ।
    'श्री गुरुग्रन्थ-दर्शन' तथा 'नानक वाणी' कृतियों ने हिन्दी तथा पंजाबी में स्थायी प्रतिष्ठा प्रदान कीं। जीवनी-ग्रन्थों जैसे गुरु नानक, स्वामी रामतीर्थ, आदि गुरु शंकराचार्य, मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम, लीलापुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण, शक्तिपुज हनुमान ने अपनी कथात्मक ललित शैली, सहज भाषा-प्रवाह तथा स्वयं एक सन्त की लेखनी से प्रणीत होने के कारण अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की ।
    नैतिक ब्रह्मचारी डॉ. मिश्र मूलत: आत्मस्वरुप में स्थित उच्चकोटि के सन्त और धार्मिक विभूति थे । एषणाविहीन, निरन्तर नामजप एवं नित्य चैतान्यमृत, निरन्तर नामजप एवं नित्य चैतान्यमृत में लीन, परम लक्ष्य संकल्पित उनका जीवन आज के युग में एक दुर्लभ उदाहरण है ।
    डॉ. जयराम मिश्र सन् 1987 में पंचतत्व में विलीन हो गये ।
    

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