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Rigved : Mandal-3, 4 & 5

Rigved : Mandal-3, 4 & 5

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  • Pages: 1065
  • Year: 2014, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788190551731
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    वेद सनातनविद्या के काव्यात्मक प्रतिपादन है ! ऋग्वेद संहिता के अनुवाद एवं व्याख्या का प्रयास अनेक भाषाओँ में समय-समय पर होता रहा है किन्तु अभी तक उपलब्ध सभी अनुवादों में काव्य पक्ष की उपेक्षा अथवा पद्यानुवाद की प्रस्तुति के असम्भव प्रयास ही किये गये हैं, जो ऋचाओं के साथ पूरा न्याय नहीं करते हैं ! वेदों में भावों की सनातनता एक व्यापक ध्वनि के रूप में सूक्तों, संवादों एवं आख्यानों में विद्यमान है ! प्रस्तुत अनुवाद में पादानुसारी किन्तु भावपरक अनुवाद पर विशेष आग्रह सोद्देश्य है ताकि ऋचाओं की काव्यात्मकता का यथासम्भव सम्प्रेषण एवं मूल की अर्थयोजना का क्रम अनुवाद में सुरक्षित रहे ! भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर परम्परा में जीवित और प्रगतिशील रखता है ! अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता एवं समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तदभव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किये गए हैं, साथ ही गंभीर एवं बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद एवं दुरूह पदों के अर्थंनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्दति एवं आधुनिक और तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गयी है ! वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी है ! अतः ऋचाओं में संशिलष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थो को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है ! व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है वहां प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है ! इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीसिप्त विशेषताएँ हैं !

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    Govind Chandra Pandey

    गोविन्द चन्द्र पाण्डे

    प्रो० गोविन्द चत्र पाण्डे इतिहास, संस्कृति और दर्शन के सुविख्यात चिन्तक हैं । पिछले पाँच दशक से आपकी लेखनी इन विषयों पर निरन्तर क्रियाशील रही है । संस्कृत और हिन्दी साहित्य, इतिहास, संस्कृति और दर्शन के क्षेत्र में अपने बहुविध योगदान के लिए विद्यावारिधि साहित्य वाचस्पति वाक्‍कपति महामहोपाध्याय और डॉक्टर आवॅ लैटर्स की मानद उपाधियों से नवनालन्दा महाविहार, नालन्दा; हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग; केन्द्रीय उच्चतर तिब्बती अध्ययन संस्थान, सारनाथ; लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ, नयी दिल्ली तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसीने अलंकृत कियाहै ।
    भारतीय परम्परा के मूल स्वर बौद्ध धर्म के विकास का इतिहास मूल्य मीमांसा साहित्य संस्कृति और सौन्दर्य इतिहास स्वरूप और सिद्धान्त शंकराचार्य : विचार और सन्दर्भ भारतीय समाज ऐतिहासिक और तात्विक विवेचना आदि इनके ग्रंथ जहाँ हिन्दी में प्रकाशित हुए हैं, वहीं फाउन्डेशन्स ऑफ इण्डियन कल्वर (दो जिल्द), अएरिजिन्स ऑफ बुद्धिज्म डॉन ऑफ इण्डियन सिविलाइजेशन आदि कृतियाँ अंग्रेजी में प्रकाशित हैं । अस्‍ताचलीयम भक्‍तिदर्शन विमर्श; सौन्दर्यदर्शन विमर्श: एक सद्द विप्रा बहुश वदन्ति अग्निबीज क्षण और लक्षण हासका तथा जया आदि के प्रणयन द्वारा प्रो० पाण्डे ने संस्कृतं और हिन्दी भाषा और साहित्य को भी अपना अमूल्य योगदान दिया है ।
    प्रोत. पाण्डे अपनी रचनाओं पर अनेकानेक पुरस्कारों से भी सम्मानित किये जाते रहे हैं जिनमें शंकर पुरस्कार मंगलाप्रसाद पारितोषिक और विज्ञान-दर्शन पुरस्कार के नाम उल्लेखनीय हैं ।
    राजस्थान एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आचार्य- अध्यक्ष एवं कुलपति रह चुके प्रीत पाण्डे सम्प्रति इलाहाबाद संग्रहालय समिति, इलाहाबाद; भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला एवं केन्द्रीय उच्चतर तिब्बती अध्ययन संस्थान, सारनाथ के अध्यक्ष पद पर आसीन रहते हुए भी अनेक ग्रंथों के लेखन और सेन्टर फाॅर, स्टडीज इन सिविलाइजेशन्स के लिए सम्पादनमें निरन्तर व्यस्त हैं ।

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