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Hindi Ki Janpadiya Kavita

Hindi Ki Janpadiya Kavita

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  • Pages: 727p
  • Year: 2018, 2nd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789386863898
  •  
    जनपदीय कविताओं के इस संकलन को प्रस्तुत करने का एक उद्देश्य यह भी समझा जा सके कि सहज होना कठिन तो है और कृत्रिम होकर सहज होना तो और कठिन है पर हिन्दी में सहजता उसके भीतर ही अनेक रूपों में पुरइन-पात की तरह पसरी हुई है । उससे अपरिचित होना हिन्दी के लिए गौरव की बात नहीं है । हिन्दी पाठ्यक्रम में लोग तर्क देते हैं कि हिन्दीतर भाषियों के लिए हिन्दी के इतने रूप देना उचित नहीं । यह तर्क लचर है । साहित्य, कोश रखकर नहीं लिखा जाता, न कोई निर्धारित साँचा रखकर लिखा जाता है । साहित्य की भाषा साँचों को तोड़ती है, नये साँचे बनाती है । साहित्य की भाषा ही जीवंत मानकों का नक्शा देती है । यह तभी संभव होता है जब साहित्य की भाषा में आदान-प्रदान भीतर-बाहर से हो । यदि हिन्दी अपनी अभ्यंतर शक्ति से अपरिचित रह जाय तो केवल बाहरी प्रभाव को लेकर वह चल नहीं सकती, चलेगी भी तो एक छोटे से वर्ग की भाषा रह जायेगी । हिन्दी की इस अभ्यंतर शक्ति के विस्तार का निदर्शन इस संकलन में है । इसके संकलनकर्त्ता इन भाषाओं के रचनाकार भी हैं और इनके सुप्रसिद्ध अध्येता भी हैं । प्रत्येक ने अपने-अपने ढंग से भूमिका भी लिखी है ।......... हर संग्रह की अपनी सीमा होती है, इसकी भी है, पर यह एक शुरुआत है । मुझे विश्वास है कि महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय का यह आरम्भ शुभ होगा । विद्यानिवास मिश्र

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    Vidyanivas Mishra

    डॉ. विद्यानिवास मिश्र

    जन्म: मकर संक्रांति, 1982 वि., गाँव पकड़डीहा, जिला गोरखपुर। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में, माध्यमिक शिक्षा गोरखपुर में, संस्कृत की पारंपरिक शिक्षा घर पर और वाराणसी में। 1945 में प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए.। हिंदी साहित्य सम्मेलन में स्वर्गीय राहुल की छाया में कोश-कार्य, फिर पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी की प्रेरणा से आकाशवाणी में कोश-कार्य, विंध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सूचना विभागों में सेवा, गोरखपुर विश्वविद्यालय, संस्कृत विश्वविद्यालय और आगरा विश्वविद्यालयों में क्रमशः अध्यापन संस्कृत और भाषा-विज्ञान का। 1960-61 और 1967-68 में कैलीफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालयों में अतिथि अध्यापक। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के निदेशक, काशी विद्यापीठ तथा संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति-पद से निवृत्त होने के बाद कुछ वर्षों के लिए नवभारत टाइम्स, नई दिल्ली के संपादक भी रहे।

    कृति संदर्भ: शेफाली झर रही है, गाँव का मन, संचारिणी, लागौ रंग हरी, भ्रमरानंद के पत्र, अंगद की नियति, छितवन की छाँह, कदम की फूली डाल, तुम चंदन हम पानी, आँगन का पंछी और बनजारा मन, मैंने सिल पहुँचाई, साहित्य की चेतना, बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं, मेरे राम का मुकुट भीग रहाहै, परंपरा बंधन नहीं, कँटीले तारों के आर-पार, कौनतू फुलवा बीननि हारी, अस्मिता के लिए, देश, धर्म और साहित्य (निबंध-संग्रह); दि डिस्क्रिप्टिव टेकनीक ऑफ पाणिनि, रीतिविज्ञान, भारतीय भाषा-दर्शन की पीठिका, हिंदी की शब्द-संपदा (शोध); पानी की पुकार (कविता-संग्रह); रसखान रचनावली, रहीम ग्रंथावली, देव की दीपशिखा, आलम ग्रंथावली, नई कविता की मुक्तधारा (सम्पादित)।

    निधन: 14 फरवरी, 2005

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