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Bhartiya Mukti Andolan Aur Premchand

Bhartiya Mukti Andolan Aur Premchand

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  • Pages: 352
  • Year: 2016, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789352211821
  •  
    प्रेमचंद के सम्पूर्ण कृतित्व को भारतीय मुक्ति-आन्दोलन की महागाथा कहा जाये तो शायद यह अत्युक्ति नहीं होगी | 1907 से लेकर 1936 तक के भारतीय जीवन-संदर्भो का उनके द्वारा प्रस्तुत सर्वागीण चित्रण का केन्द्र-बिन्दु भारतीय जनता की मुक्ति की प्रबल आकांक्षा है | वे मानते थे कि साहित्यकार-"देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सच्चाई नहीं, बल्कि उससे आगे मशाल दिखाती हुई चलनेवाली सच्चाई है |" भारतीय मुक्ति-आन्दोलन के सन्दर्भ में उनके इस कथन का विशेष अर्थ इसलिए है कि साहित्य में राजनीतिज्ञों के विचारों का अनुगमन करने की आशा की जाती है लेकिन प्रेमचंद इस भ्रम को वैचारिक और रचनात्मक दोनों स्तरों पर तोड़ने हैं | सन 1930 ई. में बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे पत्र में प्रेमचंद की अभिलाषा इसका प्रमाण है- "मेरी अभिलाषाएँ बहुत सीमित हैं | इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा यही है कि हम अपने स्वतंत्रता-संग्राम में सफल हों | मैं दौलत और शोहरत का इच्छुक नहीं हूँ | खाने को मिल जाता है | मोटर और बँगले की मुझे हबिस नहीं है | हां, यह जरुर चाहता हूँ कि दो-चार उच्चकोटि की रचनाएँ छोड़ जाऊं लेकिन उनका उद्देश्य स्वतंत्रता-प्राप्ति ही हो |" प्रेमचंद के भारतीय मुक्ति की इसी अप्रतिम सरोकारों को अभिव्यक्त करना ही मेरा लक्ष्य रहा है |

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    Saroj Singh

    डॉ. सरोज सिंह

    1 जनवरी, 1959 को जन्मी डॉ. सरोज सिंह ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाँव से व् हाईस्कूल और इन्टरमीडिएट की परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की | तत्पश्चात स्नातक व परास्नातक की परीक्षाएँ इलाहबाद से प्रथम श्रेणी व प्रथम स्थान में पास किया | कथाकार मार्कंडेय के प्रयास से प्रख्यात आलोचक डॉ. रामस्वरुप चतुर्वेदी के निर्देशन में शोधकार्य पूर्ण किया |

    सन 1984 में तिलकधारी कॉलेज, जौनपुर के हिंदी विभाग में प्रवक्ता के पद पर अध्यापन कार्य करने के साथ-साथ विभिन्न साहित्यकारों, कालखंडो और हिंदी सहित्य से सम्बद्ध विषयों पर छात्र-छात्राओं को अपने निर्देशन में शोधकार्य भी करवाया |

    वर्तमान में तिलकधारी कॉलेज में एसोशिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं |

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