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Pret Aur Chhaya

Pret Aur Chhaya

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  • Pages: 292
  • Year: 2018, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789386863447
  •  
    पारसनाथ बोला- "मैं जल्दी किसी डॉक्टर को बुला लाता हूँ । तुम यहीं बैठी रहना । घबराना नहीं, मैं अभी आता हूँ ।”-यह कहकर सामने खूँटी पर टंगे छाते को लेकर वह चला गया । मंजरी हताश भाव से फर्श पर घुटने टेककर दोनों हाथों के सहारे खटिया के डण्डे पर सिर रखकर निश्चेष्ट अवस्था में आँखें बन्द करके बैठ गयी । बाहर झमाझम पानी बरस रहा था और भीतर संध्या के प्रायान्थकार में कराल मृत्यु की मौन छाया घिरी हुई थी । मंजरी को ऐसा मालूम हो रहा था, जैसे यह प्रेतों और छायाओ के किसी घोर दु:स्वप्न-लोक में किसी दुर्गम पहाडी पथ पर एकाकी चली जा रही हैँ-किसी अज्ञात रहस्यमय अनिर्दिष्ट स्थान में बसेरा दूँढ़ने के लिए; जैसे समय बहुत कम है और चलने में शीघ्रता न करने से अनन्त अन्धकारमयी कालरात्रि उसे चारों ओर से घेरकर अपने विकराल जबडों से ग्रस लेगी । वह हाँफती हुई, ठोकरें खाती हुई केवल चली जा रही हैँ-कहाँ से चली हैं, किस दिशा की ओर भागी जा रही है, कहाँ पहुंचने पर उसे विश्राम मिलेगा, इसका कुछ भी भान उसे नहीं है । बहुत देर तक उसी दु:स्वप्न की अवस्था में यह औंधे मुँह बैठी रही | --इसी पुस्तक से

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    Ilachandra Joshi

    इलाचंद्र जोश

    जन्म : 13 दिसम्बर, 1902 ई. अल्मोड़ा में एक प्रतिष्ठित मध्यवर्गीय परिवार में हुआ । अल्मोड़ा जैसे

    प्राकृतिक रमणीय स्थान ने इनके व्यक्तित्व पर असर डाला है ।

    गतिविधियाँ : सन् 1921 में शरद बाबू से इनकी भेंट । 'चाँद' के सहयोगी सम्पादक, सन् 1929 में

    ‘सुधा’ का सम्पादन । पहला उपन्यास जो 1927 ई. में लिखा गया था, सन् 1929 में प्रकाशित हुआ ।

    'कोलकाता समाचार’, 'चाँद', ‘विश्वचाणी', ‘सुधा’, ‘सम्मेलन-पत्रिका', 'संगम', 'धर्मयुद्ध'

    और 'साहित्यकार' जैसी पत्रिकाओं के सम्पादन से भी जुडे रहे ।

    प्रमुख रचनाएँ

    उपन्यास : लज्जा, संन्यासी, पर्दे की रानी, प्रेत और छाया, निर्वासित, मुक्तिपथ, सुबह के भूले,

    जिप्सी, जहाज का पंछी, भूत का भविष्य, ऋतुचक्र ।

    कहानी : धूपरेखा, दीवाली और होली, रोमांटिक छाया, आहुति, खँडहर की आत्माएँ, डायरी के नीरस पृष्ठ, कटीले फूल लजीले काँटे ।

    समालोचना तथा निबन्ध : साहित्य सर्जना, विवेचना, विश्लेषण, साहित्य चिंतन, शरतचंद्र-व्यक्ति और कलाकार, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, देखा-परखा।

    पुरस्कार : उत्तर प्रदेश शासन द्वारा ‘ऋतुचक्र' उपन्यास पर प्रेमचन्द पुरस्कार 1969-70 ईं., राज्य साहित्यिक पुरस्कार उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 1974-75 ईं. विशिष्ट पुरस्कार उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 1976 -77, साहित्य वाचस्पति की उपाधि 1979 ईं. ।

    निधन : सन् 1982 ईं. ।

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