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Bindas Baboo Ki Diary

Bindas Baboo Ki Diary

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  • Pages: 102p
  • Year: 2006
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 818361048X
  •  
    यहाँ बिंदास बाबू की डायरी, क्रमिक देने के दो-तीन मन्तव्य हैं। एक तो यही कि वे डेढ़-दो महीने, जब भारतीय जनता ने अपने वोट से सत्ता में रहकर इतराई हिन्दुत्ववादी-अवसरवादी ब्रिगेड को सत्ता से वंचित कर डाला, उस दौर की दैनिक बड़ी घटनाओं की खबर लेते हुए, उनका एक प्रकार का रोजनामचा-सा तैयार करना स्वयं इस लेखक के लिए एक खास अनुभव रहा है। इस अनुभव को बाँटना जरूरी लगा। वे लोग जो रेडियो माध्यम को गम्भीरता से लेते हैं, उसमें कुछ करना चाहते हैं, शायद वे इस तरह की दैनिक तुरन्ता कटाक्ष-वार्ताओं के लेखन के नमूने देख सकें। इस प्रक्रिया में काम करनेवाले अनुभवों को पहचान सकें और इस अनमोल रेडियो विद्या को थोड़ा और समृद्ध बना सकें। दूसरा मन्तव्य यह समझरना-समझाना रहा कि इस तरह दैनिक किस्म का, क्षणिक-सा, बेहद टाइट समय के भीतर जो चलित वृतान्त बनता है, वह किन दबावों, तनावों, भाषायी क्षमा और प्रत्युत्पन्नमति की, इंप्रोवाइजेशन की जरूरतों की दरकार रखता है? और फिर यह जताना-बताना भी जरूरी है कि बीबीसी रेडियो सेवा एक बेहद पॉपूलर, प्रयोगधर्मी सेवा भी है, जो अपने को अग्रणी रखने के लिए चुनौती भरे प्रयोग कर सकता है। आल इंडिया रेडियो यानी आकाशवाणी वार्ताकार को क्या इतनी छूट दे सकता है? एफएम चैनलों पर प्रस्तुतियों में कुछ चैनल टपोरी भाषा का उपयोग करते हैं, उसमें सैक्सी व्यंजनाएँ या लंपट व्यंजनाएँ ज्यादा होती हैं। वे कमजोर पर हँसते हैं। ताकतवर पर नहीं हँसते। वे बॉलीवुड से मजाक कर लेते हैं ताकि ‘प्रमोट’ कर सकें। लेकिन वे सत्तावादी राजनीतिक विमर्श का मजाक सीधे-सीधे नहीं उड़ा सकते। बीबीसी यह कर सकता है। यह देख तोष होता है कि रेडियो प्रसारण में उससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। सत्तावादी राजनीतिक विमर्श पर केन्द्रित ये व्यंग्य-वार्ताएँ पाठकों को पसंद आएँगी, ऐसा हमारा विश्वास है।

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    Sudhish Pachauri

    सुधीश पचौरी

    जन्म: 29 दिसंबर, 1948; अलीगढ़ (उ.प्र.)।

    शिक्षा: एम.ए. (हिंदी, आगरा विश्वविद्यालय), पी-एच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टोरल शोध (हिंदी, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली)

    मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तंभकार, मीडिया-विशेषज्ञ, भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित।

    चर्चित पुस्तकें: नई कविता का वैचारिक आधार; कविता का अंत; दूरदर्शन की भूमिका; दूरदर्शन: स्वायत्तता और स्वतंत्रता (सं.); उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; दूरदर्शन: दशा और दिशा; नामवर के विमर्श (सं.); दूरदर्शन: विकास से बाजार तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक विमर्श; मीडिया और साहित्य; उत्तर-केदार (सं.); देरिदा का विखंडन और साहित्य; साहित्य का उत्तरकांड: कला का बाजार; टीवी टाइम्स; इक्कीसवीं सदी का पूर्वरंग; अशोक वाजपेयी पाठ-कुपाठ; प्रसार भारती और प्रसारण- परिदृश्य; साइबर-स्पेस और मीडिया; स्त्री देह के विमर्श; आलोचना से आगे; हिन्दुत्व और उत्तर-आधुनिकता; मीडिया, जनतंत्र और आतंकवाद; ब्रेक के बाद; पॉपूलर कल्चर, फासीवादी संस्कृति और सेकूलर पॉप-संस्कृति, साहित्य का उत्तर-समाजशास्त्र।

    सम्प्रति: दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर।

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