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Jansankhya Samasya Ke Istri Path ke Rastey

Jansankhya Samasya Ke Istri Path ke Rastey

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  • Pages: 196P
  • Year: 2010
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183613361
  •  
    जनसंख्या–समस्या के स्त्री–पाठ के रास्ते––– जनाधिक्य की विकराल समस्या को स्त्री–दृष्टि से पढ़ने की यह कोशिश, स्त्री–समस्या के समग्र पाठ की दिशा में खड़ी है । लेखक ने जनसंख्या–विस्फोट के पीछे स्त्री के अबलाकरण की उस ऐतिहासिक–सांस्कृतिक–सामाजिक प्रक्रिया को पाया, जो उससे उसकी ‘देह’ छीनकर, उसे प्रजनन की घरेलू–बीमार मशीन बनने को अभिशप्त कर देती है । यह प्रक्रिया पितृसत्तात्मक है, अत% जनंसख्या–विमर्श का यह नया रास्ता पितृसत्ता के चरित्र का पर्दाफाश भी है जो स्त्री की बहुविध वंचनाओं–गुलामियों व पीड़ाओं का मूल स्रोत है । विवाह–संस्था और वेश्यावृत्ति, उसके दो हाथ हैं, जिनसे स्त्री को जकड़कर, वह उसे ‘व्यक्ति’ से ‘देह’ में तब्दील कर देती हैµजिससे उसके यौन–शोषण के रास्ते प्रजनन की बाध्यता पैदा होती है, जिसका खामियाजा स्त्री अपना सामाजिक जीवन, कैरियर, सम्मान आदि गँवाकर ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और अस्तित्व तक को गँवाकर भुगतती है । स्त्री माँ बनती नहीं, बनाई जाती है, क्योंकि मातृत्व–क्षमता और माँ बनने की इच्छा में फर्क है । प्रचलित आर्थिक दृष्टि से किए जा रहे जनसंख्या–विमर्श से अलग, यह कृति उस विमर्श की पितृपक्षीय सीमाओं को भलीभाँति रेखांकित करती है, जिसमें संस्कृति, समाज–गठन तथा वर्तमान विकास से जुड़े कई पुराने–नए मिथक ध्वस्त होते हैं । ‘माँ’ का महिमांमंडन वस्तुत% उसे देह–यन्त्रणा में धकेलने की साजिश का हिस्सा है, जिसका स्पष्टीकरण लेखक ने आँकड़ों की भाषा में प्रकट किया है । पुस्तक की स्पष्ट प्रतिपत्ति है कि जनसंख्या–समस्या और स्त्री–सशक्तीकरण में परस्पर व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध है । यह समस्या पितृसत्ता की देन है, अत% इसके समुचित निवारण का अर्थ है पितृसत्ता का अवसान । इसी सार वस्तु को बेधक ढंग से प्रस्तुत करती है यह कृति, जिसकी भाषा पितृसता के प्रति आक्रोश से भरी है, क्योंकि स्त्री के प्रति संवेदनशील है । पाठकों को विचारोत्तेजित करना या हंगामा भर खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि उस सूरते–हालात को बयान करने और बदलने की कोशिश में ऐसा हुआ है, जिसका त्रासद परिणाम इस पुस्तक का जन्म है ।

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    Dr. Ravindra Kumar Pathak

    जन्म तिथि: 16.09.1974। शिक्षा: एम.ए., पी-एच.डी. (विषय हिन्दी), काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से।

    शोध-विषय: ‘हिन्दी के प्रमुख व्याकरणों का समीक्षात्मक अनुशीलन’।

    शैक्षिक उपलब्धियाँ: एम.ए. परीक्षा में स्वर्ण पदक प्राप्त। ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ की शोधवृत्ति ख्जे.आर.एफ. एवं एस.आर.एफ., प्राप्त।

    अन्य उपलब्धियाँ: (1) आकाशवाणी से कई बार कविता पाठ। (2) पुरस्कार प्राप्ति: ;पद्ध ‘भारतगान’ कविता के लिए ‘राजभाषा विभाग’ (बिहार सरकार) से पुरस्कृत ;पपद्ध ‘तांडव’ कविता के लिए ‘अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य संस्कृति विकास संस्थान’, जबलपुर से पुरस्कृत, ;पपपद्ध ‘कादम्बिनी’ की समस्या-पूखतयों, पाठक-मंचों तथा ‘मतान्तर’ स्तम्भ के अन्तर्गत कई बार पुरस्कृत, ;पअद्ध ‘कादम्बिनी’ युवा-व्यंग्य- प्रतियोगिता में पुरस्कृत। (3) पाठ्य-पुस्तक-निर्माण (कक्षा-ग्प्प्) हिन्दी, एन.सी.ई.आर.टी. (दिल्ली) के लिए सहयोग दिया।

    वर्तमान सेवा: व्याख्याता, हिन्दी-विभाग, गणेश लाल अग्रवाल कॉलेज, मेदिनीनगर (डाल्टनगंज), पलामू, झारखंड। (राँची विश्वविद्यालय के अन्तर्गत)

    स्थायी सम्पर्क सूत्र: ग्राम-पाठक विगहा, पत्रालय-पड़रावाँ (जम्होर), जिला औरंगाबाद (बिहार) पिन-824121, मोबाइल नम्बर: 09801091682

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