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Vah Jo Yatharth Tha

Vah Jo Yatharth Tha

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  • Pages: 126p
  • Year: 2017, 3rd Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183611237
  •  
    अपने सामाजिक दृष्टिकोण, भाषा और पठनीयता के लिए खासी ख्याति अर्जित करनेवाले अखिलेश वह जो यथार्थ था में कुछ नई सिद्धियों और हुनर के साथ हैं। यहाँ अखिलेश अपने बचपन के क़स्बे के ज़रिए वास्तविकता, रहस्य, विचार और कल्पना का ऐसा जादू उपस्थित करते हैं कि सारी चीज़ें नए अर्थ की रोशनी में नहाकर चमकने लगती हैं। वास्तविकताएँ अपने रहस्य प्रकटकरने लगती हैं तो रहस्य अपनी वास्तविकताएँ दिखाते हैं। विचारों में कल्पना की माया प्रविष्ट हो जाती है और कल्पना में विचारों की धार। ये कारगुजारियाँ करते हुए अखिलेश वस्तुओं और उनकी अन्विति का ऐसा विखंडन करते हैं कि उनकी छिपी-दबी हुई अनंत शक्तियाँ और सुन्दरताएँ स्वतंत्र होकर खिल जाती हैं। कथाकार अखिलेश ने अपनी इस कथित गैरकथात्मक रचना में बचपन के क़स्बे का इतना आत्मीय तथा सर्जनात्मक इस्तेमाल किया है कि वह यथार्थ था अपने समग्र रूप में क़रीब-क़रीब एक प्रभावपूर्ण उपन्यास बन जाता है। इस किताब की तैयारी में अखिलेश ने ऐसे अनोखे रसायनों का इस्तेमाल किया है कि विधाएँ तिरोहित हो जाती हैं और रचना प्रकट हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह जो यथार्थ था उपन्यास के साथ सामाजिक अध्ययन, निबंध, रिपोर्ताज, संस्मरण, आत्मकथा, कविता यहाँ तक कि यदा-कदा आलोचना विधा के भी सल्व को सोखकर गद्य के सर्वथा नये अवतार को जन्म देती है। वह जो यथार्थ था का क़स्बा लगभग तीस साल पहले तक लेखक के जीवनमें था, फिर वह लेखक की स्मृति में बसकर दूसरा क़स्बा हो जाता है और आखि़र में रचना में दाखि़ल होकर तीसरा। जबकि वह पुराना क़स्बा अपने वास्तविक जीवन में भी बदल रहा है। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक बदलाव उसका कायाकल्प कर रहे हैं। वह जो यथार्थ था उक्त रद्दोबदल का आईना भी है। इसी बिंदु पर अखिलेश का यह प्रयत्न कुछ वर्षों में हुए भारतीय समाज के परिवर्तन और पतन का रूपक बनकर हमें विराट अनुभूति से भर देता है। यह अत्युक्ति नहीं होगी कि वह जो यािार्थ था जैसी रचनाएँ किसी भाषा में कभी-कभी ही मुमकिन हो पाती हैं।

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    Akhilesh "Tatbhav"

    अखिलेश

    जन्म : 1960, सुल्तानपुर (उ.प्र.)।

    शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी साहित्य), इलाहाबाद विश्वविद्यालय।

    प्रकाशित कृतियाँ—कहानी-संग्रह : आदमी नहीं टूटता, मुक्ति, शापग्रस्त, अँधेरा। उपन्यास : अन्वेषण। सृजनात्मक गद्य : वह जो यथार्थ था। आलोचना : श्रीलाल शुक्ल की दुनिया (सं.)।

    सम्पादन : वर्तमान साहित्य, अतएव पत्रिकाओं में समय-समय पर सम्पादन। आजकल प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका तद्भव के सम्पादक। 'एक कहानी एक किताब' शृंखला की दस पुस्तकों के शृंखला सम्पादक। 'दस बेमिसाल प्रेम कहानियाँ' का सम्पादन।

    अन्य : देश के महत्त्वपूर्ण निर्देशकों द्वारा कई कहानियों का मंचन एवं नाट्य रूपान्तरण। कुछ कहानियों का दूरदर्शन हेतु फिल्मांकन। टेलिविजन के लिए पटकथा एवं संवाद लेखन। अनेक भारतीय भाषाओं में रचनाओं के अनुवाद प्रकाशित।

    पुरस्कार/सम्मान : श्रीकांत वर्मा सम्मान, इन्दु शर्मा कथा सम्मान, परिमल सम्मान, वनमाली सम्मान, अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान, स्पन्दन पुरस्कार, बाल कृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार, कथा अवार्ड।

    सम्पर्क : 18/201, इन्दिरानगर, लखनऊ-226016 (उ.प्र.)। मो. : 09415159243

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