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Sahela Re

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  • Pages: 198
  • Year: 2017, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183618557
  •  
    भारतीय संगीत का एक दौर रहा है जब संगीत के प्रस्तोता नहीं, साधक हुआ करते थे ! वे अपने लिए गाते थे और सुननेवाले उनके स्वरों को प्रसाद कि तरह ग्रहण करते थे ! ऐसा नहीं कि आज के गायकों-कलाकारों की तरह वे सेलेब्रिटी नहीं थे, वे शायद उससे भी ज्यादा कुछ थे, लेकिन कुरुचि के आक्रमणों से वे इतनी दूर हुआ करते थे जैसे पापाचारी देहधारियों से दूर कहीं देवता रहें ! बाजार के इशारों पर न उनके अपने पैमाने झुकते थे, न उनकी वह स्वर-शुचिता जिसे वे अपने लिए तय करते थे ! उनका बाजार भी गलियों-कुचों में फैला आज-सा सीमाहीन बाजार नहीं था, वह सुरुचि का एक किला था जिसमे अच्छे कानवाले ही प्रवेश पा सकते थे ! मृणाल पाण्डे का यह उपन्यास टुकड़ों-दुकड़ों में उसी दुनिया का एक पूरा चित्र खींचता है ! केंद्र में है पहाड़ पर अंग्रेज बाप से जन्मी अंजलिबाई और उसकी माँ हीरा ! दोनों अपने वक्तों की बड़ी और मशहूर गानेवालियाँ ! न सिर्फ गानेवालियाँ बल्कि खूबसूरती और सभ्याचार में अपनी मिशाल आप ! पहाड़ की बेटी हीरा एक अंग्रेज अफसर एडवर्ड के. हिवेट की नजर को भायी तो उसने उस समय के अंग्रेज अफसरों कि अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए उसे अपने घर बिठा लिया और एक बेटी को जन्म दिया, नाम रखा विक्टोरिया मसीह ! हिवेट की लाश एक दिन जंगलों में पाई गई और नाज-नखरों में पल रही विक्टोरिया अनाथ हो गई ! शरण मिली बनारस में जो संगीत का और संगीत के पारखियों का गढ़ था ! लेकिन यह कहानी उपन्यासकार को कहीं लिखी हुई नहीं मिली, बातें करके यहाँ-वहाँ बिखरी लिखित-मौखिक जानकारियों को इकटठा करके पूरा किया है ! इस तरह पत्र-शैली में लिखा गया यह उपन्यास कुछ-कुछ जासूसी उपन्यास जैसा सुख भी देता है ! मृणाल पाण्डे अंग्रेजी में भी लिखती हैं और हिंदी में भी ! इस उपन्यास में उन्होंने जिस गद्य को संभव किया है वह अनूठा है ! वह सिर्फ कहानी नहीं कहता, अपना पक्ष भी रखता चलता है और विपक्ष कि पहचान करके उसे धराशायी भी करता है ! इस कथा को पढ़कर संगीत के एक स्वर्ण-काल कि स्मृति उदास करती है और जहाँ खड़े होकर कथाकार यह कहैं बताती है, वहां से उस वक्त से कोफ़्त भी होती है जिसके चलते यह सब हुआ, या होता है !

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    Mrinal Pandey

    जन्म: 26 फरवरी, 1946 को टीकमगढ़, मध्य प्रदेश में।

    शिक्षा: एम.ए. (अंग्रेजी साहित्य), प्रयाग विश्वविद्यालय, इलाहाबाद। गन्धर्व महाविद्यालय से ‘संगीत विशारद’ तथा कॉरकोरन स्कूल ऑफ आर्ट, वाशिंगटन में चित्रकला एवं डिजाइन का विधिवत् अध्ययन।

    कई वर्ष विभिन्न विश्वविद्यालयों (प्रयाग, दिल्ली, भोपाल) में अध्यापन के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में आईं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान व वामा की सम्पादक तथा दैनिक हिन्दुस्तान की कार्यकारी सम्पादक रहीं। स्टार न्यूज और दूरदर्शन के लिए हिन्दी समाचार बुलेटिन का सम्पादन किया। दैनिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी एवं नन्दन की प्रमुख सम्पादक रहीं।

    प्रकाशित पुस्तकें: विरुद्ध, पटरंगपुर पुराण, देवी, हमका दियो परदेस, अपनी गवाही (उपन्यास); दरम्यान, शब्दवेधी, एक नीच टेªजिडी, एक स्त्री का विदागीत, यानी कि एक बात थी, बचुली चौकीदारिन की कढ़ी, चार दिन की जवानी तेरी (कहानी-संग्रह); मौजूदा हालात को देखते हुए, जो राम रचि राखा, आदमी जो मछुआरा नहीं था, चोर निकल के भागा, सम्पूर्ण नाटक (नाटक) और देवकीनन्दन खत्री के उपन्यास काजर की कोठरी का इसी नाम से नाट्य-रूपान्तरण, परिधि पर स्त्री, स्त्री: देह की राजनीति से देश की राजनीति तक, स्त्री: लम्बा सफर (निबन्ध); बन्द गलियों के विरुद्ध (सम्पादन), ओ उब्बीरी (स्वास्थ्य)।

    अंग्रेज़ी: द सब्जेक्ट इज वूमन (महिला-विषयक लेखों का संकलन), द डॉटर्स डॉटर, माई ओन विटनेस (उपन्यास), देवी (उपन्यास-रिपोर्ताज), स्टेपिंग आउट: लाइफ एंड सेक्सुअलिटी इन रूरल इंडिया।

    सम्प्रति: अध्यक्ष, प्रसार भारती।

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