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Hemant Ka Panchhi

Hemant Ka Panchhi

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  • Pages: 154p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171198260
  •  
    उसने शान्त लहजे में कहना शुरू किया, ‘‘विश्वास ? विश्वासघात ! सन्देहµनिहायत अजीबोग़रीब शब्द हैं । यह शब्द इन्सान ने खुद रचे–गढ़े हैं । हाँ, इसमें कुछेक फेरबदल ज़रूर होता है । इन्सान, पेड़–पौधे, पशु–पाखी, जीव–जन्तु-इनकी तरह विश्वास का भी अंग–प्रत्यंग होता है । ये अंग–प्रत्यंग खुद हम ही गढ़ते हैं, मगर ये होते हैं ! इस शब्द का लय–क्षय भी हैय टूटन भी हैय मृत्यु भी है । लेकिन शक बिल्कुल अशरीरी होता है । धुएँ या कुहासे की तरह ! यह ऐसा धुआँ होता है, जो आँखों को नज़र नहीं आता । फिर भी आँखों की पुतलियों में बसा होता है । धुंधली निगाह से देखो, तो सारा कुछ अस्पष्ट । इसे न मिटाया जा सकता है, न छाँटा जा सकता हैय इसे उखाड़ा भी नहीं जा सकता । तुम समझ रही हो न, मैं क्या कह रही हूँ ? शक के लिए किसी बहाने की ज़रूरत नहीं पड़ती । हमारी अपनी कमज़ोरियों की सूराख से, शक’ अन्दर दाखिल होता है । अपने आसपास फैली दुनिया से ही बहाने ढूँढ़–ढूँढ़कर, हम उसमें मिलाने की कोशिश करते हैं । एक बहाना बेकार साबित होता है, तो हम दूसरा बहाना ढूँढ़ने लगते हैं, वह भी फिट नहीं हुआ, तो फिर कोई और बहाना–––फिर कोई बहाना ! दीपक ने तो मुझ पर कभी विश्वास ही नहीं किया, तो विश्वास तोड़ने का सवाल कहाँ उठता है ? शुरू से अन्त तक वह सिर्फ शक का शिकार रहा । बच्चा क्यों नहीं हो रहा, पहले यह शक’ ! बच्चा क्यों हुआ, अगला शक’ ! मैं दफ्“तर से अगर जल्दी लौटी, तो शक’ ! देर से लौटी, तो शक’ ! तू सोच सकती है ? अब मेरी उम्र हुई, बारह साल के बेटे की माँ हूँ मैं ! मेरे बच्चे की उम्र का लड़का ! अट्ठाईस–तीस साल का बन्दा ! अब उसे लेकर मुझ पर शक’ करता है !

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    Suchitra Bhattacharya

    जन्म: 10 जनवरी, 1950

    कॉलेज जीवन में ही विवाह। सरकारी नौकरी।

    बचपन से ही साहित्य से गहरा लगाव। सन् ’60 के दशक के उत्तरार्द्ध में लेखन की शुरुआत। जीवन के विविध पक्षों और समस्याओं पर सशक्त पकड़ रखने के साथ-साथ, ख़ासकर औरत की व्यथा-कथा, समस्या, यंत्रणा और उपलब्धियों की जीवन्त तसवीर आँकने में विशेष सिद्धहस्त। उनका लेखन, इन्सानी रिश्तों और उनकी आपसी जटिलताओं की बार-बार वकालत करता है।

    कृतियाँ

    मैं हूँ रायकिशोरी, हेमन्त का पंछी, ध्वंसकाल (उपन्यास) खांचा, मैना-तदन्त, एइ माया (कहानी-संग्रह)।

    दहन और परदेस उपन्यासों का अनुवाद हिन्दी में प्रकाशित।

    ‘यही है ज़िन्दगी...’ उपन्यास ‘देश’ पत्रिका में धारावाहिक रूप में प्रकाशित। बहुचर्चित और बहुप्रशंसित। इस उपन्यास पर आधारित हिन्दी टीवी सीरियल शीघ्र टेलिकास्ट होने की प्रतीक्षा में।

    सम्मान: मंजमागुडु तिरुमलम्बा पुरस्कार, ताराशंकर पुरस्कार, साहित्य सेतु पुरस्कार, कथा पुरस्कार वगैरह कई पुरस्कारों से सम्मानित।

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