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Aalochana Se Aagey

Aalochana Se Aagey

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  • Pages: 219p
  • Year: 2006
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788171195688
  •  
    उत्तर-आधुनिकतावाद हिंदी में अब एक निर्णायक विमर्श बन चला है और उत्तर-सरच्नावादी 'पाठ' की रणनीतियां हिंदी साहित्य की उपलब्ध व्यखायाओ में नए-नए विपर्यास और उपद्रव पैदा कर रही हैं ! विखान्दंवादी पाठ-प्रविधियों ने हिंदी में नव्या-समीक्षा को रिटायर कर दिया है ! 'आलोचना' पद भी, अपनी व्यतीत आधुनिकतावादी प्रकृति और उत्तर-संरचनावादी रणनीतियों की मार के चलते, संकटग्रस्त होकर संदिग्ध हो चला है ! ये दिन आलोचन के 'विमर्श' में बलाद जाने के दिन हैं! विमर्श जो 'अर्थ' का 'उत्पादन' ही नहीं करते, उन्हें 'संगठित' भी करते हैं और अनिवार्यतः सत्तात्मक होते हैं ! विच्मर्ष वस्तुतः आलोचना का विखंडन है, इसीलिए आलोचन से आगे है ! सुधीश पचौरी ने उत्तर-आधुनिकतावादी और उत्तर-संरचनावादी विमर्शों को हिंदी में स्थापित किया है ! गत एक दशक के सभी अग्रगामी विमर्श, इन उत्तर-आधुनिकतावादी और उत्तर-संरचनावादी पदावलियों से उलझते-सुलझते चलते हैं ! समज्शास्त्रो में इन्हें लगातार जगह मिल रही है ! साहित्याध्यायनों में, पुनश्चर्या पाठ्यकर्मो में और शोधों में ये विमर्श निर्णायक होने लगे हैं ! ये वर्तमान की माँग हैं और उसका भवितव्य भी ! सुधीश पचौरी की यह किताब हिंदी के जागरूक पथाकर्ताओं के लिए एक जरूरी किताब है !

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    Sudhish Pachauri

    सुधीश पचौरी

    जन्म: 29 दिसंबर, 1948; अलीगढ़ (उ.प्र.)।

    शिक्षा: एम.ए. (हिंदी, आगरा विश्वविद्यालय), पी-एच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टोरल शोध (हिंदी, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली)

    मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तंभकार, मीडिया-विशेषज्ञ, भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित।

    चर्चित पुस्तकें: नई कविता का वैचारिक आधार; कविता का अंत; दूरदर्शन की भूमिका; दूरदर्शन: स्वायत्तता और स्वतंत्रता (सं.); उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; दूरदर्शन: दशा और दिशा; नामवर के विमर्श (सं.); दूरदर्शन: विकास से बाजार तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक विमर्श; मीडिया और साहित्य; उत्तर-केदार (सं.); देरिदा का विखंडन और साहित्य; साहित्य का उत्तरकांड: कला का बाजार; टीवी टाइम्स; इक्कीसवीं सदी का पूर्वरंग; अशोक वाजपेयी पाठ-कुपाठ; प्रसार भारती और प्रसारण- परिदृश्य; साइबर-स्पेस और मीडिया; स्त्री देह के विमर्श; आलोचना से आगे; हिन्दुत्व और उत्तर-आधुनिकता; मीडिया, जनतंत्र और आतंकवाद; ब्रेक के बाद; पॉपूलर कल्चर, फासीवादी संस्कृति और सेकूलर पॉप-संस्कृति, साहित्य का उत्तर-समाजशास्त्र।

    सम्प्रति: दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर।

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