रांगेय राघव हिन्दी के उन विशिष्ट कथाकारों में हैं जिनकी रचनाएँ अपने समय को लाँघकर भी जीवित रहती हैं।
'आग की प्यास' रांगेय राघव का एक बहुचर्चित उपन्यास है, जिसकी कथावस्तु के केन्द्र में ग्रामीण जीवन है—वहाँ की राजनीति, अर्थव्यवस्था और बदलता हुआ सामाजिक-धार्मिक परिवेश। लेकिन मुख्य कथावस्तु अर्थकेन्द्रित है। समाज के कुछ इने-गिने लोगों की धन की प्यास कैसे वृहत्तर समुदाय का जीवन नारकीय बनाती जा रही है, यह इस उपन्यास में प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुआ है। अगर शासन आम आदमी के जीवन को दूभर बना देनेवाली, दिनोंदिन बढ़ती महँगाई को नहीं रोक पा रहा है, तो इसके पीछे भी उन्हीं अर्थपिशाचों का हाथ है। वे अपनी आर्थिक शक्ति से राजनीति को नियंत्रित करते हैं।
राजनीति और अर्थव्यवस्था के इस चोली-दामन सम्बन्ध को उजागर करने के साथ-साथ लेखक ने शहरी चेतना से आक्रान्त ग्रामीण जीवन का भी विश्वसनीय चित्र इस उपन्यास में प्रस्तुत किया है। कुल मिलाकर यह उपन्यास आज के गाँवों की जिन्दगी का एक जीवन्त दस्तावेज़ है।

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