रचनाकार 'है' की चर्चा करता है और 'होना चाहिए' के इरादे से करता है। दोनों का निर्माण देखने के कोण से होता है और यह कोण हर रचनाकार का अपना होता है। इस परिप्रेक्ष्य में शैलेन्द्र मिश्र के संग्रह 'अभय' से गुजरना यह सुखद अनुभूति देता है कि कवि अपने समय के द्वन्द्व और तनाव से न केवल वाकिफ है, उसे व्यक्त करने की सटीक भाषा भी उसके पास है। उनकी कविताओं से गुजरना एक ऐसी ताज़ा संवेदना से गुजरना है, जो फैशनेबुल मुहावरों से अलग अपने होने को प्रमाणित करने के लिए उत्सुक ही नहीं संघर्षरत भी है। शैलेन्द्र मिश्रा के अनुभव विलक्षण नहीं हैं, विलक्षण हैं उन अनुभवों को अर्थ देने वाली उनकी काव्यानुभूति की बुनावट। कवि के संग्रह से उम्मीद की जाती है अनुभूतियों की ताज़गी और उनको व्यक्त करने का नयापन। दोनों ही स्थलों पर वे अकूत सम्भावना के कवि लग रहे हैं। वे समाज, राजनीति अर्थव्यवस्था और संस्कृति आदि के निहित विडम्बनाओं को बखूबी उजागर करते हैं और जीवन-विरोधी शक्तियों से निरन्तर मुठभेड़ करते हैं। निरीह, सजावटी, खोती और विपुल होती वस्तुओं के माध्यम से जागतिक यथार्थ के बीहड़ में संदर्भ, संवेदना तथा रचनात्मक सूझ-बूझ का अच्छा परिचय देते हैं। वस्तु-पूजा और सर्वग्राही बाजार कवि की चेतना को मथता है। उसके क्रूर तंत्र, पेच और कार्यप्रणाली पर कवि की पैनी नज़र है। इनसे लैस कविताओं का उम्मीद है पाठक समुदाय द्वारा भरपूर स्वागत किया जाएगा।
- श्रीप्रकाश मिश्र

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