आधुनिक शिक्षा व्यवस्था केवल उच्च और मध्यम वर्गों की सेवा करती है। निम्न-मध्य और निम्न वर्गों के विद्यार्थी इसमें अपनी वास्तविकताओं के बरक्स खड़ी दुनियाओं के अनुकरण से ज़्यादा कुछ हासिल नहीं करते। कुछ प्रयास इस दिशा में ज़रूर हुए हैं कि वंचित और हाशिए पर पड़े लोगों तक शिक्षा पहुँचे, लेकिन वह किस रूप में पहुँच पाई है और कितनी, इसका कोई स्पष्ट आकलन हमारे सामने नहीं है। एक सरोकारवान शोध अध्ययन पर आधारित यह पुस्तक कुछ ऐसे पैमानों को गढ़ने की कोशिश करती है जिनके द्वारा हम अभिवंचित समुदायों तक पहुँची शिक्षा की गुणवत्ता, स्वरूप और मात्रा का अन्दाज़ा लगा सकते हैं। साथ ही शिक्षा के अपने अधिकार को हासिल करने में क्या कुछ करना आवश्यक है, इसका भी उल्लेख किया गया है। शोध के आधार पर मिले परिणामों के विश्लेषण से शैक्षिक परिदृश्य में सकारात्मक परिवर्तन हेतु एक व्यावहारिक मॉडल के निरूपण का प्रयास भी यह पुस्तक करती है। यह पुस्तक इस बात को भी विशेष रूप से रेखांकित करती है कि अभिवंचित तबकों के बच्चे भी इस देश की उतनी ही मूल्यवान पूँजी हैं जितने सम्पन्न और खाते-पीते लोगों की सन्तानें। ज़रूरत है बस निष्ठा और ईमानदारी के साथ उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने, और उससे भी ज़्यादा मुख्यधारा में इनके लिए स्थान बनाने की।

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