निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः।
अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः॥
तुम किसी से अपेक्षा मत रखो, विकार युक्त मत होओ, चिन्ता मत करो और हल्के हो जाओ। हृदय को शीतल रखो। तुम्हारी बुद्धि की पकड़ किसी को न मिले, वह असीम में लगी रहे। किसी कारण से अशान्त मत होओ। तुम केवल अपने हृदय स्वरूप में ही अपनी निष्ठा रखो।


