प्यार क्या है? केवल एक अनुबन्ध, या जीवन को जीने का एक सलीका? क्या प्यार वही होता है जो स्त्री-पुरुष के परिणय-बिन्दु पर आकर ठहर जाता है? या फिर उसकी वास्तविक भूमिका इस मोड़ के बाद शुरू होती है? इस उपन्यास का आख्यान इसी बिन्दु से आरम्भ होता है। लेखिका के ही शब्दों में ‘प्यार शादी की रस्म तक खेला गया महज़ रोमांचक खेल नहीं है।’ वह दो सचेत व्यक्तियों के मध्य प्रतिबद्धता का एक पुल है जो उनके जीवन-प्रवाह को मर्यादा भी देता है, और एक-दूसरे के पास, भीतर और आर-पार जाने का रास्ता भी उपलब्ध कराता है। यह उपन्यास सच के धरातल पर घटित प्यार और प्रतिबद्धता का ही आख्यान है। एक ऐसी प्रतिबद्धता जिसको क़ानूनी मोहर और सामाजिक पहरेदारियों की ज़रूरत नहीं पड़ती। जो फूल की तरह ख़ुद-ब-ख़ुद खिलती है और अपनी सुगन्ध से अपने सम्पर्क में आनेवाली हर इकाई को सुवासित कर देती है। लेखिका का पाठक से निवेदन है : ‘चरित्रों का खिलना-खुलना और आपके दिल के नज़दीक आकर बैठ जाना सहज हो तो आप-हम मिलकर उस सुसंस्कृत समाज की कल्पना करें, जहाँ कोई किसी की सम्पत्ति को न्यासी की तरह सँभालने को तैयार हो, जहाँ राधा-कृष्ण के प्रेम की पवित्रता को केवल पूजा न जाए, जिया जाए।’

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