‘बाईसवीं सदी’ राहुल सांकृत्यायन का पहला उपन्यास है। गोकि उन्होंने इसे भ्रमण-वृत्तान्त, निबन्ध और शब्दचित्र कहा था। वास्तव में यह अपने ढंग की अनूठी रचना है जो विधागत सीमाओं का अतिक्रमण करने के बावजूद अपनी औपन्यासिकता बचाए रखती है और असाधारण रूप से पठनीय है। इसमें राहुल ने भविष्य का वह चित्र आँका है जिसकी परिकल्पना उनके मन में थी। वे जिस समय—1924 में—यह पुस्तक लिख रहे थे उस समय रूस में साम्यवादी क्रान्ति हो चुकी थी और भारत में आज़ादी की लड़ाई असहयोग आन्दोलन के बाद नए मोड़ पर पहुँच चुकी थी। वे आज़ादी की लड़ाई में ख़ुद सक्रिय थे। ज़ाहिर तौर पर उनके सामने बराबरी और आज़ादी का एक उद्देश्य एक आदर्श था जिसकी प्रेरणा इस कृति में स्पष्ट दिखाई देती है।
‘बाईसवीं सदी’ एक ऐसे समाज का ख़ाका पेश करता है जो ज्ञान-विज्ञान में उन्नति हासिल कर, पुरानी व्यवस्था को आमूल बदलकर अभाव और भेदभाव की समस्त बेड़ियाँ तोड़ चुका है। कहना आवश्यक नहीं कि भावी समय का यह आख्यान पाठक को एक तरफ़, वर्तमान समाज की विषमताओं और बन्धनों के विरुद्ध सचेत करता है तो दूसरी तरफ, बराबरी पर आधारित समाज के स्वप्न को साकार करने के लिए प्रेरित भी।
हिन्दी का पहला यूटोपियाई उपन्यास!

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