उस दिन अचानक मानुस और बानुस आमने-सामने आ खड़े हुए। दरअसल बानुस नाम भी उन्हें मानुसों ने ही दिया। उन्हें तो यह भी मालूम नहीं था कि नाम होता क्या है।
फिर वे जंगल में आस-पास साथ-साथ रहने लगे; और तब उनके बीच के असली फ़र्क सामने आए। बात बस इतनी नहीं थी कि मानुसों ने अपने आगे के दो पैरों को खड़े होकर हाथ बना लिया था, वे उन हाथों से ऐसे काम भी करने लगे थे जिनके बारे में बानुसों को समझ ही नहीं आता कि उन्हें करना ही क्यों है!
पत्थरों को किसलिए तोड़ना है? पेड़ों की टहनियों को पेड़ों से छीनकर घसीटते हुए क्यों कहीं ले जाना है! घोड़ों को बाड़े में किसलिए बंद करना है? और फिर बानुसों को ही ये कह देना कि अब तुम जंगल छोड़कर कहीं और चले जाओ, जहाँ चाहो! क्या बेतुकी बात!
लेकिन बानुसों को भागना पड़ा, मानुसों से बचने के लिए; लेकिन अब मानुसों ने उन्हें पकड़ना शुरू किया और न जाने कहाँ ले जाने लगे...तो बानुसों और मानुसों की यह दास्तान दरअसल प्रकृति और मनुष्य के द्वंद्व की दास्तान है। दास्तानगोई के रिवायती फ्रेम में कसी यह दास्तान बताती है कि मनुष्य कैसे वाचाल होता गया, और प्रकृति कैसे स्तब्ध; मनुष्य कैसे गतिमान होता गया, और प्रकृति कैसे असहाय; मनुष्य कैसे सामर्थ्यवान होता गया और प्रकृति अपनी अथाह शक्ति के बावजूद कैसे मनुष्य की शक्ति-लालसा का निरीह शिकार!
लेकिन प्रकृति पर मनुष्य की यह विजय क्या सचमुच उतनी स्थायी है, जैसी उसे मालूम पड़ रही है? शायद नहीं! दूसरों को भले जीत ले मनुष्य, अपने भीतर अपने ही ख़िलाफ़ चलने वाले संग्राम से कैसे जीतेगा!

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