भारत में आजादी के बाद सामान्य जीवन स्तर में जहां काफी सुधार दिखता है, और मध्यवर्ग का विस्तार भी उल्लेखनीय स्तर पर हुआ है, वहीं यह भी एक हकीकत है कि न तो हमारी गिनती अमीर और विकसित देशों में की जा सकती है, और न ही वास्तविक धरातल पर वह सुख-समृद्धि कहीं दिखाई देती है, जो किसी भी विकसित देश में होनी चाहिए।
इसके अनेक कारण रहे हैं, सिर्फ जनसंख्या इसकी वजह नहीं है जैसा कि अक्सर कह दिया जाता है। यह किताब उन्हीं वास्तविक कारणों पर उंगली रखती है जिनके चलते हम विकासशील की श्रेणी से चाहकर भी नहीं निकल पा रहे हैं। विकास की प्रभावशीलता को कमजोर करने वाले एक घटक के रूप में लेखक यहां अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र की बहुतायत और श्रम-बल में सामाजिक सुरक्षा का अभाव को रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि गरीबी में कमी, मानव क्षमताओं में वृद्धि और निरन्तर आर्थिक विकास के बीच पारस्परिक रूप से एक मजबूत सम्बन्ध है।
लेखक के अनुसार किसी भी विकासशील देश में गरीबों के बहुत कम शिक्षित, या पूर्णतः निरक्षर होने की सम्भावना होती है। इस प्रकार, हम भारत के सामने मौजूद शैक्षिक संकट की गहराई को समझे बिना भारत में गरीबी को नहीं समझ सकते।
भारत में बच्चों और वयस्कों में कुपोषण का स्तर दुनिया में सबसे ऊँचे स्तरों पर है, फिर भी ऐतिहासिक रूप से इस पर उस तरह का नीतिगत ध्यान नहीं दिया गया, जैसा दिया जाना चाहिए। ऐसे तमाम कारणों पर विस्तार से बात करते हुए इस पुस्तक में इनके निवारण पर भी गहराई से विचार किया गया है।

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