भूतनाथ एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने किए पुराने पाप के दंश से पीड़ित है, अतीत से छुटकारा पाना चाहता है और अन्त में वह नहीं रह जाता जो शुरू में था; यानी विकासशील, बहुआयामी और अनप्रेडिक्टेबिल (जिसके बारे में कोई अंदाजा न लगाया जा सके) चरित्र है। वह प्रायश्चित्त करता है आत्मस्वीकृति की तरह अपनी जीवनी लिखकर; इसके इस अपराधबोध ने उसे उपन्यास का सबसे जीवन्त, विकासशील और कर्मठ नायक बना डाला है। जितना ही अपने अतीत से वह बचना चाहता है उतना ही वह बार-बार उसके सामने लाया जाता है... खलनायकों द्वारा डराने, धमकाने, गलत काम कराने या ब्लैक-मेलिंग के लिए, या इन्द्रदेव जैसों द्वारा सही रास्ते पर लाने के लिए। वह भयानक और खूँख्वार ऐयार है—चौकन्ना, चुस्त, फुर्तीला, विलक्षण और अद्भुत... और ज़िन्दगी को दुबारा सम्मानपूर्वक जीने की ललक, पीछे की सारी कलंक-कालिमा पोंछकर साफ-सुथरे हो पाने की तड़प उसे राजा बीरेंद्रसिंह के मुसाहिब ऐयारों तक ले जाती है...
भूतनाथ में न केवल वासना, लालच, प्रतिशोध की सहज मानवीय कमजोरियाँ अपने आदिम रूप में हैं, बल्कि द्वन्द्व, पश्चात्ताप, ग्लानि और इन सबसे ऊपर उठ सकने का प्रयास भी इसी में सबसे अधिक है। कुचलती और भींचती सीमाओं के बीच टूटना एक बहुत बड़ी वास्तविकता हो सकती है, मगर उन्हें संक्रमित करने का संघर्ष ही किसी चरित्र को गत्यात्मकता देता है। हो सकता है, ‘गोदान’ का होरी अन्त में हार ही गया हो, मगर उसके चरित्र की सारी गहराई और गति इसी संघर्ष से आई है। भूतनाथ के दुश्मन भी कहीं बाहर नहीं; अपने भीतर ही मौजूद हैं।


