भीष्म साहनी ने बहैसियत कथाकार पठनीयता और क़िस्सागोई की कला को इस तरह साधा था कि आलोचक जहाँ उनकी दृष्टि के वैशिष्ट्य से प्रभावित होते थे, वहीं साधारण पाठक कहानी के कहानीपन से। शहरी और क़स्बाई मध्यवर्गीय जीवन में ज़्यादा सहूलियत महसूस करनेवाली उनकी लेखनी ने ज़रूरत पड़ने पर समाज के बीभत्स और भयावह चित्रों को भी अंकित किया। यह वैविध्य इन कहानियों में भी मिलता है। अभी तक असंकलित रही इन कहानियों में ‘सफ़ाई अभियान’ जैसी कहानियाँ भी हैं जो सफ़ेदपोश मध्यवर्ग की वैचारिक दिशाहीनता और सामाजिक निष्क्रियता के दो पहलुओं को एक साथ रेखांकित करती हैं, और 'दुलारी का प्रेमी' जैसी समाज के पिछवाड़े बसी ज़िन्दगी के काले कोनों को उजागर करती कहानियाँ भी। साम्प्रदायिक सद्भाव भीष्म जी के कथाकार की स्थायी
चिन्ताओं में हमेशा रहा। इस संग्रह में शामिल कहानी ‘मैं भी दिया जलाऊँगा, माँ।' गहरे मानवीय बोध के साथ इसी विषय को सम्बोधित कहानी है जिसमे एक मुस्लिम बच्चे के मन
को अत्यन्त करुणा और भावप्रवणता के साथ उकेरा गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि भीष्म साहनी के पाठकों के लिए यहाँ-वहाँ प्रकाशित होती रही इन कहानियों की एकत्र प्रस्तुति पाठकों के लिए एक उपहार साबित होगी।

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