'छंद-शती' ब्रजभाषा काव्य परम्परा का नया कीर्तिमान है जिसमें शताधिक छंदों का रेखानुकृति संयुक्त संकलन किया गया है।
अगर ब्रजभाषा का कोई सर्वथा निजी छंद कहा जा सकता है तो वह मेरे निकट सवैया है। परिचित और अनुकूल विधि से जब भी मैं सवैया छंद को सुनता हूँ तो मेरे भीतर आत्मीय स्पंदनों का एक स्रोत फूट पड़ता है।
प्राचीनता और नवीनता को मिलाने, और उन्हें एक नैरन्तर्य तक ले जाने में यदि मेरा कृतित्व अंशतः भी सेतु का कार्य कर सका तो मैं मानूँगा कि मेरा लेखन और सोच सार्थक हुआ।
ब्रजभाषा-साहित्य जीवन के जिस अमृत-स्रोत से अभिसिंचित होता रहा है वह समय के साथ बीत जाने वाला नहीं है और आज भी अगर उससे सम्पृक्त होने की ललक किसी देशी या विदेशी साहित्यानुरागी में दिखायी दे अथवा मेरे जैसा कोई हठी रचनाधर्मी उसे हीनता या अपराध का द्योतक मानने को तैयार न हो तो... उसके दृष्टिकोण को समझने की चेष्टा भी की जानी चाहिए।
-डॉ. जगदीश गुप्त

