समकालीन पीढ़ी के चुनिन्दा लेखकों में से एक उमा शंकर चौधरी का ‘अयोध्या बाबू सनक गए हैं’ के बाद यह दूसरा कहानी-संग्रह है। उनकी कहानियाँ अपने समय की विसंगतियों का काला चिट्ठा हैं। ये कहानियाँ धुर गाँव से लेकर शहर तक का सफर करती हैं और इस सफर में अपने समय के उन अनछुए पहलुओं पर विचार करती हैं जिन पर हमारी निगाह बहुत आसानी से नहीं जा पाती है। भूमंडलीकरण के बाद के भारत की तसवीर कैसी बदली है और उसकी चमक में अँधेरा कहाँ-कहाँ फैला है, उमा शंकर अपनी कहानियों में इसे दिखाने की पूरी कोशिश करते हैं। इनके पात्र हाशिये पर पड़े हुए वे लोग हैं जिन्हें इस बाजारवादी संस्कृति में सिर्फ इसलिए भुला दिया गया है क्योंकि वे इस लोकतंत्र में एक वोट तो हैं लेकिन उपभोक्ता में तब्दील नहीं हो पाए हैं।
उमा शंकर चौधरी ने अपने लेखन में भाषा और शिल्प के साथ-साथ विषय के स्तर पर भी खूब प्रयोग किये हैं। यही कारण है कि ‘ललमुनियाँ मक्खी...’ कहानी में एक मक्खी कहानी की पात्र बनती है तो वहीं दूसरी ओर ‘कट टू दिल्ली...’ में प्रधानमंत्री का प्रवेश होता है और इस समाज का एक विद्रूप सच हमारे सामने आ जाता है। ‘कट टू दिल्ली...’, ‘मिसेज वाटसन की भुतहा कोठी’, ‘ललमुनियाँ मक्खी...’ जैसी कहानियाँ कहानी की दुनिया में विषय के स्तर पर किये गए प्रयोग के नायाब उदाहरण हैं।
उमा शंकर चौधरी का यह संग्रह अपनी पीढ़ी और अपने समय में एक विश्वसनीय उपस्थिति दर्ज करने वाला है।

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