उपन्यासकार के रूप में यशपाल की विशिष्टता का एक आयाम उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता भी है। साहित्य उनके लिए रचनाकार की वैयक्तिक कार्यशाला नहीं है, उसका पहला उद्देश्य सामाजिक अधिरचना में हस्तक्षेप है, इसीलिए उनके उपन्यास एक तरफ समाज की तसवीर खींचने का प्रयास करते हैं, तो दूसरी तरफ उसमें वैचारिक हस्तक्षेप भी करते हैं।
‘दादा कामरेड’ विषय ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सक्रिय एक गुप्त क्रान्तिकारी दल और उसके अन्तर्विरोध हैं जिसमें यशपाल ने अपने यथार्थ अनुभवों के आधार पर कुछ अत्यन्त ही विश्वसनीय और सजीव चित्रों का विधान किया है। इसके अलावा इस उपन्यास में उन्होंने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को भी मार्क्सवादी नजरिए से देखने-समझने का प्रयास किया है। अपने साहसी विवरणों के लिए अपने समय में अत्यन्त चर्चित रहा यह उपन्यास आज भी स्त्री विमर्श के दृष्टिकोण से बहुत अहमियत रखता है। उपन्यास की नायिका शैल कहती है, “जब स्त्री को एक आदमी से बँध जाना है और सामाजिक अवस्थाओं के अनुसार उसके अधीन रहना है, उस पर निर्भर करना है, उस सम्बन्ध को कुछ भी नाम दिया जाए, वह है स्त्री की गुलामी ही।”

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