आज फिर करते हो किस ज़ोम प’ ज़ख़्मों का शुमार
सरफिरो! वादी-ए-पुरख़ार में ये तो होगा
क्यूँ निगाहों में है अफ़सुर्दा चराग़ों का धुवाँ
आरज़ू-ए-लबो-रुख़्सार में ये तो होगा
एक से एक कड़ी मंज़िले-जाँ आएगी
रहगुज़ारे-तलबे-यार में ये तो होगा
होंठ सिल जाएँ मगर जुरअते-इज़्हार रहे
दिल की आवाज़ को मद्धम न करो दीवानो!
ढल चुकी रात तो अब कुहर भी छट जाएगी
अब भी उम्मीद की लौ कम न करो दीवानो!
आँधियाँ आया ही करती हैं हरिक हब्स के बाद
गुलशुदा शम्ओं का मातम न करो दीवानो!

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